शनि देव का भयानक श्राप- साढ़े साती क्यों रुलाती है? 7 लक्षण, 9 अचूक उपाय, शनि देव के 10 नाम, आरती और चालीसा (Complete Guide)

शनि देव की उत्पत्ति की कथा (भाग 1)
त्रेता युग में सूर्य देव का विवाह
त्रेता युग में सूर्य देव ने विश्वकर्मा जी की पुत्री देवी संज्ञा से विवाह किया। विवाह के बाद सूर्य देव जब भी उनके पास आते, तो देवी संज्ञा सूर्य देव के तेज (ऊर्जा / प्रकाश) को सहन नहीं कर पाती थीं। इस प्रकार समय बीतता गया।
देवी संज्ञा से संतान
कुछ वर्षों बाद देवी संज्ञा ने तीन तेजस्वी संतानों को जन्म दिया:
वैवस्वत मनु
यमराज
यमुना
फिर भी सूर्य देव के असहनीय तेज के कारण देवी संज्ञा हमेशा असहज रहती थीं।
देवी संज्ञा का निर्णय — तपस्या करना
सूर्य तेज को सहन करने योग्य बनने के लिए देवी संज्ञा ने एक दिन निर्णय लिया कि वह सूर्य लोक छोड़कर तपस्या करने जाएंगी। लेकिन एक समस्या थी — नवजात बच्चों की देखभाल कौन करेगा? और वह यह भी चाहती थीं कि सूर्य देव को यह पता न चले कि वे सूर्य लोक छोड़कर जा रही हैं।
छाया (सर्वाणा) का प्रकट होना

देवी संज्ञा ने अपने सिद्धि से अपनी ही जैसी दिखने वाली एक छाया रूप उत्पन्न की। उस छाया का नाम रखा गया — देवी सर्वाणा।
उन्होंने सर्वाणा को बच्चों की जिम्मेदारी सौंप दी और खुद तपस्या करने के लिए अज्ञात स्थान पर चली गईं।
सूर्य देव को धोखा
अब सूर्य देव जब भी अपनी पत्नी के पास आते, तो देवी छाया सूर्य देव के तेज का प्रभाव सहन कर लेती थी। सूर्य देव ने उसे ही संज्ञा माना और समय बीतता गया। इस बीच मनु, यमराज और यमुना बड़े हो गए, और सूर्य देव ने उन्हें योग्य कार्यों की जिम्मेदारी भी सौंप दी।
देवी छाया की तपस्या और इच्छा
अब सूर्य देव अपने कार्यों में व्यस्त रहते थे और देवी छाया अकेली पड़ गईं। उन्होंने महादेव (भगवान शिव) की तपस्या प्रारंभ की।
कई वर्षों तक कड़ी तपस्या करने के बाद, छाया ने गर्भ धारण किया। तपस्या के बाद महादेव प्रकट हुए और उन्होंने देवी छाया को वरदान दिया।
देवी छाया ने कहा—
“मुझे एक असली जीवन मिले।”
क्योंकि वह केवल संज्ञा की छाया थीं और एक स्वतंत्र पहचान चाहती थीं।
शनि देव का जन्म
कुछ महीनों बाद देवी छाया ने एक पुत्र को जन्म दिया। वह बालक:

काले वर्ण के थे
कुपोषित जैसा दिखाई देता था
बहुत दिव्य ऊर्जा लिए हुए था
वह बालक और कोई नहीं — शनि देव ही थे।
उनका रंग काला इसलिए था क्योंकि:
1. देवी छाया ने तपस्या के दौरान धूप में भूखे-प्यासे रहकर कठोर साधना की।
2. वह स्वयं “छाया” थीं — उस प्रभाव का असर बालक पर भी पड़ा।
सूर्य देव का क्रोध

एक दिन सूर्य देव महल में आए और देवी छाया ने उन्हें अपने पुत्र शनि से मिलवाया।
सूर्य देव ने जैसे ही शनि देव को देखा, वे क्रोधित हो गए। उन्होंने कहा—
“इस बालक में न तो मेरा तेज है, न रूप, न गुण — यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता!”
उन्होंने शनि देव को स्वीकार करने से इंकार कर दिया और छाया को भी अपमानित कर दिया।
यही वह क्षण था जब सूर्य देव और शनि देव के बीच शत्रुता की शुरुआत हुई।
शनि देव का बढ़ता सामर्थ्य
समय के साथ शनि देव बड़े हुए। महादेव की तपस्या के प्रभाव से वे:अत्यंत शक्तिशाली गुस्सैल और साहसी बन गए थे।कम उम्र में ही उन्होंने कई गंधर्वों को पराजित कर दिया देवताओं से टक्कर लेने लगे
अपनी शक्ति और क्रोध दोनों का उपयोग करते थे
शनि देव का क्रोध और शक्ति का बढ़ना
बाल्यकाल से कठोर बनने का कारण
शनि देव बचपन से ही कठोर और शक्तिशाली थे। इसका कारण था:
पिता सूर्य देव द्वारा अस्वीकार किया जाना
मन में जमा हुआ गहरा क्रोध और पीड़ा
शनि देव का एक मात्र लक्ष्य था —
“सूर्य देव से भी अधिक शक्तिशाली बनना और उनके घमंड को तोड़ना।”
जैसे-जैसे समय बीतता गया, उनके अंदर सूर्य देव के प्रति क्रोध और घृणा बढ़ती गई।
विवाह एवं श्राप
चित्ररथ से विवाह
जब शनि देव युवा हुए, उनके गुस्से को शांत करने के लिए उनका विवाह चित्ररथ नामक साध्वी कन्या से किया गया। चित्ररथ तेजस्विनी और पवित्र चरित्र की थी। विवाह के बाद शनि देव का मन धीरे-धीरे शांत होने लगा।
श्राप की घटना
एक दिन शनि देव गहरे ध्यान में बैठे थे। उस समय देवी चित्ररथ ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा व्यक्त की। शनि देव ध्यानमग्न थे, इसलिए उन्होंने उत्तर नहीं दिया।
बार-बार पूछने पर भी जब कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली, तो देवी चित्ररथ को यह अपमान जैसा लगा। क्रोध में आकर उन्होंने शनि देव को श्राप दे दिया:
“आज से यदि शनि किसी व्यक्ति पर नज़र उठाकर देखेंगे, तो उसका पतन निश्चित होगा।”
इस श्राप के कारण शनि देव ने अपना सिर झुकाकर चलना शुरू कर दिया।
घटना के बाद शनि देव ने पत्नी को समझाने की बहुत कोशिश की। देवी चित्ररथ को गलती का एहसास तो हुआ, परंतु श्राप वापस लेने की सामर्थ्य उनके पास नहीं थी।
असुर गुरु शुक्राचार्य का प्रस्ताव
शनि देव के इस श्राप की खबर पूरे ब्रह्मांड में फैल गई। यह बात असुरों के गुरु शुक्राचार्य तक भी पहुंची। वे असुर सेनापति राहु के साथ शनि देव के पास आए और प्रस्ताव रखा:
“देवताओं के विरुद्ध चलो, अपनी शक्ति हमारे साथ उपयोग करो।”
पर शनि देव ने स्पष्ट कहा —
“मैं अपनी शक्ति का उपयोग किसी स्वार्थ या विनाश के लिए नहीं करूंगा।”
और उन्होंने शुक्राचार्य व राहु को वहां से जाने के लिए कह दिया।
देवी संज्ञा की वापसी और सत्य का प्रकट होना
उधर पृथ्वी पर तपस्या कर रहीं देवी संज्ञा, सूर्य देव के तेज को सहन करने योग्य बन चुकी थीं। वे सूर्य लोक लौटीं और उन्हें सारी सच्चाई पता चली — कि छाया (सर्वाणा) उनकी जगह रह रही थी और शनि उसी छाया के पुत्र हैं।
संज्ञा ने सूर्य देव को सम्पूर्ण सत्य बता दिया। यह सुनकर सूर्य देव क्रोधित हो उठे। और फिर:
उन्होंने देवी छाया को अपमानित किया
शनि देव को स्वीकारने से फिर इनकार किया
दोनों को सूर्य लोक से निष्कासित कर दिया
शनि देव और माता छाया का वनवास
निष्कासन के बाद माता छाया और शनि देव पृथ्वी की ओर आए और एक सुंदर घने वन में रहने लगे। यहीं पर उनकी मित्रता काकराज (एक श्रेष्ठ पक्षी/कौवा) से हुई।
माता-बेटे का जीवन सुखपूर्वक गुजरने लगा।
सूर्य देव का हमला
कुछ वर्षों बाद सूर्य देव को पता चला कि शनि देव कहाँ रहते हैं। क्रोध में आकर उन्होंने अपने तेज और माया से उस वन में अग्नि प्रज्वलित कर दी।
देवी छाया, छाया रूप होने के कारण अग्नि से तो बच निकलीं…
लेकिन आगे क्या हुआ?
शनि देव का काकलोक पहुँचना
सूर्य देव द्वारा जलाई गई मायावी अग्नि में शनि देव पूरी तरह घिर गए।
माता छाया सहायता के लिए पुकारने लगीं। उसी समय काकराज (कौवों के राजा) आकाश से उतरे और शनि देव को अपने पंजों में पकड़कर आग से बाहर ले गए।
काकराज ने शनि देव को अपने काकलोक में ले जाकर अपनी माता से मिलवाया। काकराज की माता ने शनि देव को अपने पुत्र के समान स्नेह दिया और उनसे वहीं रहने की विनती की। शनि देव ने सहमति दी, और कुछ समय तक शांति से वहीं रहे।
इंद्र का हमला और शनि देव का क्रोध
कुछ समय बाद, यह बात इंद्र देव तक पहुँची कि शनि देव काकलोक में हैं। शनि देव और काकराज की अनुपस्थिति में इंद्र ने हमला कर दिया।
सभी कौवों की मृत्यु हो गई
काकराज की माता भी वीरगति को प्राप्त हुई
यह देखकर शनि देव और काकराज अत्यंत क्रोधित हो उठे।
शनि देव ने अपना शक्ति-ऊर्जा का कुछ भाग काकराज में समाहित किया, और उन पर सवार होकर स्वर्ग लोक की ओर बढ़ गए।
शनि देव का स्वर्ग लोक प्रवेश
स्वर्ग लोक में देवता उत्सव, नृत्य और सोमरस का आनंद ले रहे थे।
अचानक आकाश में भयंकर गर्जना हुई — शनि देव काकराज पर सवार आ रहे थे।
उनका रूप — काल जैसा भयावह।
देवताओं में भगदड़ मच गई।
शनि देव ने स्वर्ग में कदम रखते ही:
अपनी तिरछी दृष्टि से देवताओं की शक्ति छीन ली
और फिर अपनी दृष्टि की तेज ऊर्जा से उन्हें भूमि पर गिरा दिया
सभी देवता — यहाँ तक कि इंद्र भी — शक्तिहीन हो गए।
देवताओं को स्वर्ग छोड़कर भागना पड़ा।
सूर्य देव का आगमन और शनि देव की दृष्टि
सभी देवता सूर्य देव को याद करने लगे और उनसे निवेदन किया कि शनि देव को रोका जाए। सूर्य देव स्वर्ग आए और शनि देव को आदेश दिया:
“ये विनाश रोक दो!”
परंतु शनि देव ने स्पष्ट इंकार कर दिया।
सूर्य देव ने अपनी घातक किरणों से आक्रमण किया, पर शनि देव ने अपनी दृष्टि से ही उस ऊर्जा को नष्ट कर दिया।
और फिर — अपनी कु-दृष्टि सूर्य देव पर डाल दी।
सूर्य देव पूरी तरह काले और शीतल पड़ गए।
उनके प्रकाश के बुझते ही:
सम्पूर्ण आकाशगंगा अंधकार में डूब गई
हर दिशा में सिर्फ अंधेरा फैल गया
सूर्य देव स्वर्ग छोड़कर भागने को मजबूर हो गए।
देवताओं की शरणस्थली — कैलाश पर्वत

देवता अपनी अंतिम शक्ति का उपयोग करके कैलाश पर्वत पहुँचे और भगवान शिव के समक्ष सब कुछ कहकर रो पड़े।
महादेव ने:
देवताओं को डांटा
और आश्वासन दिया कि वे सबकी शक्ति वापस दिलाएँगे
महादेव ने अपने शिवगणों के साथ देवताओं को स्वर्ग भेजा।
युद्ध — शनि देव बनाम देवता + शिवगण
स्वर्ग पहुँचते ही देवताओं ने शनि देव को युद्ध के लिए ललकारा।
शनि देव युद्धभूमि में आए।
सभी देवता और शिवगण एक साथ शनि देव पर टूट पड़े
शनि देव ने बचते हुए काकराज पर बैठकर तिरछी दृष्टि का प्रयोग किया
उनकी दृष्टि पड़ते ही:
शिवगण और देवता शक्तिहीन होकर भूमि पर गिर पड़े
शनि देव ने इंद्र देव और सूर्य देव को भी बेहोश कर दिया
शनि देव ने स्वर्ग लोक पर अधिकार कर लिया और इंद्र का राज मुकुट भी छीन लिया।
फिर दोनों को बंदी बनाकर स्वर्ग के कारागार में डाल दिया।
बाकी देवता वापस कैलाश गए और महादेव से शनि देव को रोकने की विनती करने लगे।
महादेव का आगमन
महादेव अंतर्याध्यान होकर प्रकट हुए।
पूरा स्वर्ग लोक हिल गया। एक तीव्र हलचल उठी — महादेव का आगमन हो चुका था।
महादेव ने आदेश दिया:
“शनि, यह विनाश अब रोक दो!”
शानि देव — सिर झुकाए हुए — बोले:
“मैं आदेश नहीं मानता।”
महादेव ने युद्ध घोषित किया।
घबराए शनि देव ने जल्दबाज़ी में अपनी कु-दृष्टि महादेव पर डाल दी।
क्या हुआ आगे?
महादेव ने अपने तीसरे नेत्र को शनि देव की ओर खोल दिया…
महादेव का तीसरा नेत्र और शनि देव का पतन
शनि देव ने महादेव पर अपनी दृष्टि डाल दी। इसके उत्तर में महादेव ने अपने तीसरे नेत्र को हल्का सा खोला।
तीसरे नेत्र से निकली केवल थोड़ी-सी ऊर्जा ही इतनी प्रचंड थी कि —
शनि देव का शरीर बीच से फट गया
वे गंभीर रूप से घायल होकर बेहोश हो गए
जोरदार झटके से स्वर्ग से पृथ्वी की ओर गिरने लगे
स्वर्ग में उसी क्षण सभी देवताओं की शक्ति वापस लौट आई।
शनि देव तेज गति से गिरते हुए पृथ्वी पर एक विशाल पीपल के वृक्ष की शाखाओं में आ अटके। उस समय उनकी स्थिति अधमरी जैसी हो चुकी थी — ऐसा लगा जैसे अब जीवन समाप्त होने वाला है।
शनि देव की तपस्या

थोड़ी देर बाद शनि देव को होश आया।
उन्हें एहसास हुआ कि महादेव की शक्ति कितनी अपार है।
यहीं से शनि देव की क्रोध से भरी यात्रा → तपस्या और समर्पण में बदली।
शनि देव ने महादेव को गुरु मान लिया और उसी पीपल वृक्ष पर पड़े-पड़े कठोर तपस्या में लीन हो गए।
शरीर में इतनी शक्ति भी नहीं थी कि वे हिल-डुल सकें।
दिन बीतते गए
महीने बीते
फिर वर्षों बीत गए
शनि देव अडिग रहे — घोर तपस्या।
शनि देव का पुनर्जन्म (शक्ति का पुनरुद्धार)
लंबी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव शनि देव के सामने प्रकट हुए।
महादेव पहले से ही उनकी क्षमता, धैर्य और साहस से प्रभावित थे।
महादेव ने:
शनि देव को पीपल वृक्ष से अंतर्याध्यान कर अंतरिक्ष में पहुंचा दिया
उनका शरीर पूरी तरह स्वस्थ कर दिया
उन्हें एक दिव्य त्रिशूल प्रदान किया
और फिर — शनि देव को एक अपना लोक भेंट किया। “इस लोक का नाम होगा — शनि लोक।”
शनि देव — ब्रह्माण्ड के न्यायाधीश
महादेव ने समस्त देवताओं और ब्रह्मांड के सामने घोषणा की:

“आज से शनि देव पूरे ब्रह्मांड के न्यायाधीश होंगे। जो जैसा कर्म करेगा, शनि उसे वैसा ही फल देंगे।”
इसी क्षण से शनि देव बने —
न्याय के देवता (Lord of Karma and Justice)

सूर्य देव का पश्चाताप और परिवार का मिलन
इधर सूर्य देव और अन्य देवताओं को अपने व्यवहार का पश्चाताप हुआ।
सूर्य देव पृथ्वी पर गए, देवी छाया से क्षमा माँगी और उन्हें पुनः सूर्य लोक वापस ले आए।
अब:
सूर्य देव
देवी संज्ञा
देवी छाया
शनि देव
सभी मिलकर शांति से रहने लगे।
शनि देव और साढ़े साती क्या है?

शनि देव कहते हैं कि —
किसी भी व्यक्ति पर साढ़े साती, ढैया या महादशा अचानक नहीं आती।
यह प्रभाव उस व्यक्ति की जन्म कुंडली में स्थित ग्रहों के योग के आधार पर आता है।
बिना ग्रह योग के वे किसी के जीवन में प्रवेश नहीं कर सकते।
यह योग जन्म के समय ही विधि और नियति द्वारा निर्धारित हो जाता है।
साढ़े साती कब से शुरू होती है?
अधिकतर लोग मानते हैं कि जब शनि की छाया आप पर पड़ती है तभी साढ़े साती शुरू होती है,
लेकिन शनि देव के अनुसार यह एक मिथ्या धारणा है।
वास्तव में —
शनि की साढ़े साती तीन राशियों पर 7.5 वर्ष चलती है
हर राशि पर 2 साल 6 महीने (ढाई साल) का समय होता है
इसलिए इसे ढाई-ढाई साल के तीन भागों में बाँटा जाता है, जिसे ढैया कहा जाता है।
साढ़े साती का पहला चरण (ऊपरी शरीर पर प्रभाव)
पहला ढाई साल व्यक्ति के ऊपरी शरीर और मानसिक स्थिति को प्रभावित करता है।
इस दौरान व्यक्ति को —
मानसिक संघर्ष
काम में हानि
तनाव और अवसाद
जल्द गुस्सा आने की समस्या
का सामना करना पड़ सकता है।
क्योंकि इस समय शनि:
दिमाग (Brain)
जीभ (Speech)
आँखों (Vision)
कान (Hearing)
को प्रभावित करते हैं।
इसी कारण —
व्यक्ति गलत निर्णय लेता है
छोटी-छोटी बातों में गुस्सा आता है
गुस्से में ऐसी बातें बोल देता है जिससे रिश्ते खराब हो जाते हैं
भविष्य धुंधला दिखाई देता है
सकारात्मक बातें भी नकारात्मक लगती हैं
यह समय मानसिक परीक्षा का होता है।
साढ़े साती का दूसरा चरण (पेट और मध्य शरीर पर प्रभाव)
जब शनि देव का दूसरा ढाई साल शुरू होता है, तो उनका प्रभाव दिमाग से हटकर पेट और मध्य शरीर (चेस्ट से नीचे) पर आता है।
इस दौरान अक्सर व्यक्ति यह अनुभव करता है:
पेट से संबंधित समस्याएँ
पाचन तंत्र कमजोर होना
गैस, एसिडिटी, उलझन
वजन तेजी से बढ़ना
क्योंकि अब शनि मानसिक परीक्षा छोड़कर शरीर की परीक्षा शुरू करते हैं।
इस चरण में व्यक्ति को अच्छा भोजन मिलने लगता है, लेकिन वही भोजन बीमारी का कारण भी बन सकता है।
शरीर भारी होने लगता है और कई बार स्वास्थ्य समस्या शुरू हो जाती है।
साढ़े साती का तीसरा चरण (पैर और जीवन में परिवर्तन)
अंतिम ढाई साल में शनि देव का प्रभाव पैरों और जीवन की दिशा पर आता है।
इस चरण को सबसे महत्वपूर्ण और फलदायी कहा गया है क्योंकि:
पहले पाँच साल की संघर्ष और परेशानियों का निराकरण होने लगता है
जीवन में सुख, समृद्धि, सफलता और धन आने लगता है
व्यक्ति को यात्राओं के अवसर मिलते हैं — देश-विदेश घूमने तक
यह समय “फल प्राप्ति का समय” कहा जाता है।
बहुत से लोग पहले दो ढाई वर्षों के संघर्ष के कारण टूट जाते हैं,
और कुछ लोग सफलता के अंतिम चरण तक पहुँचने से पहले ही हार मान लेते हैं।
जिनका जीवन इसी दौरान समाप्त हो जाता है, ऐसा माना जाता है कि:
अगला जन्म शुरू होते ही वहीं से साढ़े साती जारी होती है जहाँ पिछली रुकी थी।
शनि देव की दृष्टि (कभी प्यार, कभी परीक्षा)
शनि देव की दृष्टि हमेशा व्यक्ति पर होती है —
कभी प्रेम से, कभी परीक्षा के रूप में।
साढ़े साती का समय किसी को कंगाल बना देता है और किसी को राजा बना देता है।
सब कुछ व्यक्ति के कर्म, स्वभाव और व्यवहार पर निर्भर करता है।
शनि का उद्देश्य सज़ा देना नहीं होता,
बल्कि गलतियों से शुद्ध कर बेहतर बनाना होता है।
श्रीवत्स राजा — लक्ष्मी बनाम शनि: न्याय का फैसला
स्वर्ग में विवाद और निर्णय

पुराणों के अनुसार एक बार स्वर्गलोक में माता लक्ष्मी और शनि देव के बीच बहस छिड़ गई।
लक्ष्मी जी कहने लगीं — “मैं श्रेष्ठ हूँ।”
शनि देव बोले — “मैं श्रेष्ठ हूँ।”
जब ये विवाद न सुलझा, तो दोनों ने धरती के किसी ईमानदार राजा से फैसला करवाने का निश्चय किया।
राजा श्रीवत्स — न्याय के लिए प्रसिद्ध
उस समय पृथ्वी पर प्रयागराज में एक न्यायप्रिय राजा रहते थे — नाम था श्रीवत्स।
उनकी ईमानदारी और न्याय के कारण वे दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे।
शनि देव और माता लक्ष्मी दोनों राजा श्रीवत्स के पास गए और अपना-अपना पक्ष रखा।
राजा श्रीवत्स घबरा गए — अगर उन्होंने शनि को श्रेष्ठ कहा तो लक्ष्मी नाराज़ होंगी; और अगर लक्ष्मी को श्रेष्ठ कहा तो शनि का प्रकोप उनकी राज्य पर आ सकता था।
रानी चित्रांगा का उपाय (बुद्धिमानी कदम)
रानी चित्रांगा ने राजा को सुझाव दिया:
दोनों को श्रेष्ठ मत बताओ।
दो सिंहासन बनवा दो — एक सोने का (दायाँ) और एक चाँदी का (बायाँ)।
सोने वाला दायाँ और चाँदी वाला बायाँ रखें।
जब लक्ष्मी और शनि आएँ, तो लक्ष्मी दाहिने (माँ-सरूप) पर बैठेंगी और शनि बाएँ।
उनसे कोई भी प्रश्न मत करना; जब वे पूछें तो बोल देना कि “आप दोनों ने स्वयं ही अपना फैसला कर लिया।”
राजा को रानी का सुझाव ठीक लगा — और वही योजना अपनाई गई।
फैसला और शनि का क्रोध
एक माह बाद वही हुआ — लक्ष्मी जी सोने पर विराजमान हुईं और शनि देव चाँदी के सिंहासन पर बैठे।
जब दोनों ने अपनी श्रेष्ठता का प्रमाण माँगा, राजा ने कहा कि उन्होंने स्वयं निर्णय कर लिया — मैं क्या उत्तर दूँ?
यह सुनकर शनि देव क्रोधित होकर चले गए।
लक्ष्मी जी ने राजा को चेतावनी दी कि शनि का रोष बड़े कष्ट ला सकता है, पर साथ ही कहा— “मैं तेरे साथ हूँ।”
अकाल, पतन और राजा का परित्याग
शनि देव के प्रकोप से राजा के राज्य में भारी अकाल पड़ा। लोग भूखे मरने लगे; राज्य वीरान हो गया।
एक वर्ष के बाद राजा ने अपने राज्य को छोड़ने का निर्णय लिया। पत्नी के साथ वे निकल पड़े — कुछ हीरे-जवाहरात और आभूषण एक पोटली में बांध कर साथ ले गए, सोचा विपत्ति में वे काम आएँगे।
लेकिन एक भयंकर तूफ़ान में रास्ता भटक गया। अंततः एक नदी के किनारे पहुँच कर वे हताश हो गए।
लक्ष्मी की मदद और शनि की चाल
उसी समय माता लक्ष्मी ने एक छोटी कन्या का रूप लेकर राजा-रानी की मदद की — लालटेन पकड़ा कर उन्हें नदी के किनारे छोड़ दिया और गायब हो गईं।
तभी एक नाविक (जो असल में शनि देव का वेश था) आया और राजा-रानी को पार ले जाने लगा — पर नाव कमजोर थी और तीन बार में केवल एक-एक को ही पार ले जा पाया। तीसरी बार जब राजा की पोटली साथ थी, नाविक गायब हो गया — पोटली भी खो गई।
अब उनके पास धन-संपत्ति न के बराबर रह गई; भूख और संकट खड़ा हो गया। राजा–रानी गाँव में बस गए और लकड़ियाँ बेचकर जीवन यापन करने लगे।
चन्दन का बाग़ और नया वैभव
लक्ष्मी जी की कृपा से राजा को जंगल में चन्दन का बाग मिला। चन्दन की लकड़ियाँ बेचकर राजा धीरे-धीरे धन कमाने लगे। वह सुखी जीवन बिताने लगे — तब शनि देव ने एक और षड्यंत्र रचा।
सौदागर, जहाज़ और रानी का अपहरण
गाँव का एक सौदागर जो लकड़ियाँ ले जाकर बेचता था, जहाज़ के पास फंस गया। शनि देव ने ब्राह्मण का वेश धारण कर उन लोगों से कहा कि यदि पति-वाला/पति-वाला स्त्री (विशेष प्रकार का स्पर्श) जहाज़ को छूए तो जहाज़ चलेगा। गाँव की सभी औरतों ने छुआ पर जहाज़ नहीं चला — केवल एक औरत बचेगी: वह थी रानी चित्रांगा।
सौदागर ने रानी को अपने जहाज़ पर खींच लिया और जहाज़ दूर चला गया। राजा चिल्लाता रहा पर जहाज़ बहुत दूर जा चुका था।
रानी ने सौदागर की छेड़खानी सहन नहीं की और सूर्य से प्रार्थना की — तब अचानक उसका रूप कुरूप हो गया जिससे सौदागर का लोभ मर गया और वह रानी को जहाज़ पर नहीं ले गया। पर फिर भी रानी को साथ रख लिया गया।
राजा का आश्रम, चाँदी की ईंटें और पुनरुत्थान
राजा नदी किनारे साधुओं की सेवा करने लगे। उनकी साधुना और लक्ष्मी की कृपा से जो उपले बनते थे वे सोने की ईंटें बन जाते — फिर राजा के पास सोने की बहुत सारी ईंटें हो गईं।
एक दिन वह वही सौदागर अपने जहाज़ पर लौटा। राजा ने उसे अपने ईंटे दिखाकर कहा — अगर तू मेरी पत्नी को लेकर चला गया तो मैं ये सोने की ईंटें दे दूँगा। सौदागर लालची होकर राजा को जहाज़ पर ले जाकर नदी में फेंक दिया, पर राजा बच निकला और गाँव में नौकरी पा गया — बगीचे का माली बन गया।
एक राजकुमारी राजकुमारी (राजा की पुत्री से) ने राजा को देखा और उससे प्रेम कर लिया। बाद में राजा-राजकुमारी का विवाह हुआ और राजा का जीवन सुधर गया।
सौदागर लौटता है — ईंटों का विवाद
सात वर्ष पूरे हुए और शनि देव का प्रभाव खत्म होने को आया। उसी दिन उस सौदागर का जहाज़ आया और राजा ने उसे रुकवा दिया — आरोप था कि उसी के पास उनकी सोने की ईंटें हैं। सौदागर गुस्से में दरबार गया और विवाद उठा।
कहानी यहाँ इस तरह खत्म नहीं हुई — आगे राजा ने कहा कि ईंटें एक-साथ जुड़ी हुई हैं; यदि कोई इन्हें खोल सके तो वही उनका असली मालिक होगा — और अगर ईंटें नहीं खोल पाए तो मैं…
ईंटों का सच और न्याय का पल
राजा श्रीवत्स ने दरबार में कहा:
“दिखाऊंगा उन ईंटों को, अगर ये तुम्हारी ईंटें हैं तो इन्हें खोलकर दिखाओ।”
सौदागर (जो लालच और झूठ में डूब चुका था) पूरे दिन उन ईंटों को खोलने की कोशिश करता रहा —
लेकिन एक भी ईंट नहीं खुली।
शाम होने पर राजा के दामाद श्रीवत्स (जो वास्तव में वही राजा थे, जो साधुओं के साथ रह रहे थे) आगे आए।
उन्होंने शांत मन से ईंटों को हाथ लगाया और देखते ही देखते एक-एक ईंट अलग हो गई।
दरबार में सन्नाटा छा गया।
राजा ने पूछा:
“यह कैसे संभव हुआ? तुम कौन हो?”
तब श्रीवत्स ने पूरी कथा सुनाई —
कैसे सौदागर ने चालाकी से उनकी रानी चित्रांगा को छीन लिया,
कैसे उन्होंने विपत्ति में जीवन बिताया,
और कैसे लक्ष्मी जी की कृपा से चन्दन की ईंटें सोने की बनीं।
राजा ने तुरंत आदेश दिया:
“चित्रांगा को पालकी में लाओ — और इस सौदागर को पकड़ कर सख्त सज़ा दो!”
रानी का रूप पुनः लौटना
रानी चित्रांगा पालकी में लाई गई।
उन्होंने सूर्य भगवान से प्रार्थना की:
“हे सूर्य देव! मेरा रूप वैसा ही कर दीजिए जैसा पहले था।”
सूर्य देव प्रकट हुए और उनकी कृपा से
चित्रांगा पहले से भी सुंदर हो गईं।
सम्मान, समृद्धि और घर वापसी
राजा ने श्रीवत्स को सम्मानपूर्वक बहुत सारा धन दिया,
उनकी पत्नी चित्रांगा को अपनी बेटी माना,
और अपनी वास्तविक बेटी को भी श्रीवत्स के साथ विदा किया।
कुछ समय बाद वे अपने राज्य लौट आए और फिर से सिंहासन पर विराजमान हुए।
प्रजा खुश हो गई, राज्य फिर से समृद्ध हो गया।
शनि देव का प्रकट होना — अंतिम संदेश
एक दिन शनि देव प्रकट हुए और बोले:
“राजन, लक्ष्मी और मेरे बीच प्रतियोगिता तो केवल बहाना था।
हम तुम्हारी सत्यता और धर्म की परीक्षा ले रहे थे।”
फिर
शनि देव ने तीन ऐसे गुण बताए
जिनके कारण कोई मनुष्य कभी नष्ट नहीं होता:
1. विपत्ति में भी धर्म न छोड़े
जो कठिन समय में भी सत्य और धर्म न छोड़े, उसका कभी नाश नहीं होता।
देवता स्वयं उसकी सहायता करते हैं।
2. गरीबी में भी अन्याय न करे
गरीबी आने पर जो पाप या गलत रास्ता न चुने,
वह सदैव देवताओं का कृपा-पात्र बनता है।
लक्ष्मी उसकी सहायता करती हैं।
3. धन आने पर अहंकार न करे
जो व्यक्ति धन पाकर अभिमान न करे,
गुरुजनों और गरीबों का अपमान न करे,
शनि उसका कभी बुरा नहीं करता।
शनि देव ने आशीर्वाद दिया:
“मेरी कृपा से पल भर में धनवान बना सकता हूँ
और क्षण मात्र में कंगाल भी।
पर जो धर्म वाला हो, उसे मैं कभी नष्ट नहीं करता।
जाओ राजन — तुम्हारा राज्य सुख, शांति और संपत्ति से भर जाएगा।”
इसके साथ शनि देव और माता लक्ष्मी वहाँ से चले गए।
कहानी का संदेश धन से नहीं, धर्म से जीवन बदलता है।विपत्ति में सत्य, गरीबी में ईमानदारी,और समृद्धि में विनम्रता —यही मानव को अजेय बनाते हैं
शनि देव को खुश करने के 9 प्रभावी उपाय (शनिवार के उपाय)
1. काले तिल, आटा और शक्कर का दान हर शनिवार काले तिल, आटा और शक्कर मिलाकर चींटियों के लिए छोड़ दें।
यह शुभ कर्म माना जाता है और शनि की पीड़ा कम करता है।
2. काले घोड़े की नाल / नाव की कील की अंगूठी अगर शनि का प्रभाव सही नहीं है तो —
शनिवार के दिन सूर्यास्त के समय काले घोड़े की नाल या नाव की कील से बनी अंगूठी मध्यमा (middle) उंगली में पहनें।
3. शनि देव के 108 नामों का जाप शनि दोष कम करने के लिए रुद्राक्ष की माला से 108 बार इन नामों का जाप करें:
“कोणस्थ पिंगल भबरू कृष्णा रोद्रांतक यौम शौरी शनिश्चर मंद पिप्पलाक्ष्य”
4. शनिवार को दान करना न भूलें शनिवार के दिन इन वस्तुओं का दान शुभ माना जाता है:
काले तिल
काला कपड़ा
कम्बल
लोहे के बर्तन
उड़द की दाल
दान करने से शनि देव प्रसन्न होते हैं और कृपा बनी रहती है।
5. हनुमान जी का पूजन बंदर हनुमान जी का रूप माने जाते हैं, इसलिए:
बंदरों को गुड़-चना खिलाएं
प्रत्येक शनिवार हनुमान चालीसा का पाठ करें

हनुमान जी शनि दोष से रक्षा करते हैं।
6. नीले फूल चढ़ाकर पूजा शनिवार को शनि देव को नीले फूल चढ़ाएं और मंत्र का जाप करें:
ॐ शं शनैश्चराय नमः
रुद्राक्ष की माला से 108 बार जाप करें।
7. सरसों तेल का उपाय शनिवार सुबह स्नान करके:
एक कटोरी में सरसों का तेल लें
उसमें अपना चेहरा देखें
फिर वही तेल किसी गरीब को दान कर दें
इससे दुर्भाग्य व बाधाएँ दूर होती हैं।
8. पीपल पूजा सुबह स्नान करके:
पीपल के पेड़ को जल अर्पित करें
पेड़ की 7 बार परिक्रमा करें
वहाँ दीपक जलाएं
यह उपाय शनि की दृष्टि को शांत करता है।
9. तांबे के लोटे से जलाभिषेक तांबे के लोटे में जल भरें, उसमें काले तिल मिलाएं और शिवलिंग पर चढ़ाएं।
इससे रोग और आर्थिक तंगी दूर होने का विश्वास है।
शनि देव की आरती | Shani Dev Aarti

॥ आरती श्री शनि देव जी की ॥
जय जय शनि देव, भक्तन हितकारी
सूरज के पुत्र प्रभु, छाया महतारी॥
जय जय श्री शनि देव…॥
श्याम अंक वक्र दृष्टि, चतुर्भुजा धारी
नीलाम्बर धारण नाथ, गज की असवारी॥
जय जय श्री शनि देव…॥
क्रीट मुकुट शीश रजित, दीपत है लीलारी
मुक्तन की माला गले, शोभित बलिहारी॥
जय जय श्री शनि देव…॥
मोदक मिष्ठान पान, चढ़त है सुपारी
लोहा तिल तेल उड़द, महिषी अति प्यारी॥
जय जय श्री शनि देव…॥
देव दनुज ऋषि मुनि, सुमिरन नर-नारी
विश्वनाथ धरत ध्यान, शरण है तुम्हारी॥
जय जय श्री शनि देव…॥
शनि देव की चालीसा | Shani Dev Chalisa

॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।
दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥
—
॥ चालीसा ॥
जयति जयति शनिदेव दयाला।
करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥
चारि भुजा, तनु श्याम विराजै।
माथे रतन मुकुट छबि छाजै॥
परम विशाल मनोहर भाला।
टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥
कुण्डल श्रवण चमाचम चमके।
हिय माल मुक्तन मणि दमके॥
कर में गदा त्रिशूल कुठारा।
पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥
पिंगल, कृष्णो, छाया नन्दन।
यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन॥
सौरी, मन्द, शनी, दश नामा।
भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥
जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं।
रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं॥
पर्वतहू तृण होई निहारत।
तृणहू को पर्वत करि डारत॥
राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो।
कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो॥
बनहूँ में मृग कपट दिखाई।
मातु जानकी गई चुराई॥
लखनहिं शक्ति विकल करिडारा।
मचिगा दल में हाहाकारा॥
रावण की गति-मति बौराई।
रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥
दियो कीट करि कंचन लंका।
बजि बजरंग बीर की डंका॥
नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा।
चित्र मयूर निगलि गै हारा॥
हार नौलखा लाग्यो चोरी।
हाथ पैर डरवायो तोरी॥
भारी दशा निकृष्ट दिखायो।
तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥
विनय राग दीपक महं कीन्हयों।
तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों॥
हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी।
आपहुं भरे डोम घर पानी॥
तैसे नल पर दशा सिरानी।
भूंजी-मीन कूद गई पानी॥
श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई।
पारवती को सती कराई॥
तनिक विलोकत ही करि रीसा।
नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥
पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी।
बची द्रौपदी होति उघारी॥
कौरव के भी गति मति मारयो।
युद्ध महाभारत करि डारयो॥
रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला।
लेकर कूदि परयो पाताला॥
शेष देव लखि विनती लाई।
रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥
वाहन प्रभु के सात सुजाना।
जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥
जम्बुक सिंह आदि नख धारी।
सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं।
हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं॥
गर्दभ हानि करै बहु काजा।
सिंह सिद्धकर राज समाजा॥
जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै।
मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी।
चोरी आदि होय डर भारी॥
तैसहि चारि चरण यह नामा।
स्वर्ण, लौह, चाँदी अरु तामा॥
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं।
धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥
समता ताम्र, रजत शुभकारी।
स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी॥
जो यह शनि चरित्र नित गावै।
कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥
अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।
करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥
जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई।
विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत।
दीप दान दै बहु सुख पावत॥
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा।
शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥
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॥ दोहा ॥
पाठ शनिश्चर देव को, की हों भक्त तैयार।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥