बद्रीनाथ धाम के रहस्य 2026: इतिहास, चमत्कार, परम्पराएँ और पौराणिक कथाएँ”

बद्रीनाथ धाम के रहस्य 2026: इतिहास, चमत्कार, परम्पराएँ और पौराणिक कथाएँ”

बद्रीनाथ धाम के रहस्य 2026

 

बद्रीनाथ धाम – जहाँ प्रकृति और आध्यात्मिकता मिलकर चमत्कार रचती है

 

 

 

बद्रीनाथ की दिव्य फुहारें, शीतल हवा और हिमालय का शांत वातावरण तन-मन को भिगोकर एक अनोखी आध्यात्मिक अनुभूति कराते हैं। आज भले ही यहाँ पहाड़ काटकर सुगम सड़कें बनाई गई हैं, लेकिन लगभग पाँच हज़ार वर्ष पहले जब पांडव द्रौपदी के साथ स्वर्गारोहण के मार्ग पर निकले थे, तब यह क्षेत्र कठिन और रहस्यमयी हुआ करता था।

बद्रीनाथ पहले भगवान शिव का निवास था

बद्रीनाथ धाम के रहस्य 2026

कम ही लोग यह जानते हैं कि बद्रीनाथ धाम मूल रूप से भगवान शिव और माता पार्वती का निवास स्थान था।
पुराणों में वर्णित एक अद्भुत कथा के अनुसार—भगवान विष्णु ने इस तपस्वी स्थान को पाने के लिए एक लीला रची।

भगवान विष्णु का बालक रूप वाली कथा

बद्रीनाथ धाम के रहस्य 2026

कहते हैं, हजारों वर्ष पहले जब देवता और ऋषि धरती पर विचरण करते थे, तब हिमालय की गोद में बसे बद्रीवन में शिव-पार्वती अपने परिवार सहित निवास करते थे।
यह स्थान अत्यंत शांत, पवित्र और ध्यान साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता था।

भगवान विष्णु को भी यह स्थान अत्यंत प्रिय लगा और उन्होंने यहाँ तपस्या करने का संकल्प लिया।
लेकिन सीधे माँगने के बजाय उन्होंने एक अनोखी लीला रची—
वे एक छोटे बालक का रूप लेकर जोर-जोर से रोने लगे।

माता पार्वती ने जब बालक को देखा तो उनका हृदय करुणा से भर गया और उन्होंने उसे अपनी गोद में उठा लिया।
भगवान शिव ने उन्हें चेतावनी भी दी कि यह साधारण बालक नहीं है, लेकिन माता ममता में डूब गईं।

जैसे ही माता पार्वती बालक को कक्ष में लेकर गईं, भगवान विष्णु ने योग बल से कक्ष का द्वार बंद कर दिया।
भगवान शिव जब अंदर आना चाहते थे, तो द्वार नहीं खुला।
तभी बालक ने अपना वास्तविक रूप प्रकट कर भगवान विष्णु कहा—

“प्रभु, मुझे यह स्थान अत्यंत प्रिय है।
कृपया यहाँ रहने की अनुमति दें।
आप कृपया केदारनाथ पधारें।”

भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए यह विनती स्वीकार की और केदारनाथ चले गए।
तभी से—

बद्रीनाथ विष्णु का धाम
केदारनाथ शिव का धाम
स्थापित हो गया।

आदि शंकराचार्य द्वारा बद्रीनाथ की पुनर्स्थापना

बद्रीनाथ धाम के रहस्य 2026

समय के साथ प्राकृतिक आपदाओं और आक्रमणों के कारण बद्रीधाम क्षतिग्रस्त हो गया था।
लेकिन आठवीं सदी में आदि गुरु शंकराचार्य ने इसे पुनः स्थापित किया।

कहा जाता है कि उन्हें स्वप्न में भगवान विष्णु के दर्शन हुए और अलकनंदा नदी के किनारे एक शालिग्राम स्वरूप में मूर्ति मिलने का संकेत मिला।
शंकराचार्य ने उस स्थान पर भगवान बद्रीनारायण को विधिवत स्थापित किया और तब से यह धाम पुनः विश्वप्रसिद्ध हो गया।

बद्रीनाथ की दिव्यता और महिमा

बद्रीनाथ सिर्फ एक मंदिर नहीं—
यह आध्यात्मिक उन्नति का द्वार है।

समुद्र तल से ऊँचाई: 10170 फीट

चारों ओर: बर्फ से ढकी हिमालय की चोटियाँ

पास बहती: अलकनंदा नदी

वातावरण: तपस्या, साधना और ध्यान के लिए अद्वितीय

कहा जाता है कि यही वह स्थान है जहाँ नारद मुनि ने विष्णु की आराधना कर उन्हें साक्षात दर्शन प्राप्त किए थे।

हर वर्ष लाखों भक्त यहाँ आकर दिव्य ऊर्जा का अनुभव करते हैं।
यहाँ की शांति, वातावरण और प्राकृतिक सौंदर्य मिलकर एक ऐसा भाव जगाते हैं जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है।

बद्रीनाथ धाम का रहस्य – शंख बजाने की मनाही

बद्रीनाथ में एक बड़ा रहस्य यह भी है कि यहाँ शंख बजाना निषिद्ध है।
इसके पीछे एक पुराणिक कथा जुड़ी है, जिसे स्थानीय लोग आज भी मानते हैं।

बद्रीनाथ में शंख क्यों नहीं बजाया जाता – पौराणिक रहस्य
हालांकि बद्रीनाथ भगवान विष्णु का धाम है, फिर भी यहाँ शंख नहीं बजाया जाता। इसके पीछे एक अत्यंत रोचक पौराणिक कथा है। लेकिन इस रहस्य को जानने से पहले बद्रीनाथ मंदिर में स्थित भगवान विष्णु की दिव्य मूर्ति का इतिहास समझना आवश्यक है।

बद्रीनाथ मंदिर में स्थापित मूर्ति का रहस्य

बद्रीनाथ धाम के रहस्य 2026

बद्रीनाथ धाम में भगवान विष्णु की जो दिव्य मूर्ति स्थापित है, उसकी लम्बाई लगभग 1 मीटर है और यह शालीग्राम शिला से निर्मित मानी जाती है। ऐसा विश्वास है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने इसे अलकनंदा नदी से निकालकर स्थापना की थी। यह मूर्ति भगवान विष्णु की स्वयं प्रकट हुई प्रतिमा के समान मानी जाती है।

 मूर्ति अलकनंदा में क्यों बहाई गई थी?

बद्रीनाथ धाम के रहस्य 2026

छठी–सातवीं शताब्दी के आसपास जब मंदिर की सुरक्षा के लिए कोई सैनिक नहीं थे, तब हुड़ों और बौद्ध उपद्रवियों के भय से पुजारियों ने इस दिव्य मूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए अलकनंदा नदी में प्रवाहित कर दिया।

सैकड़ों वर्षों बाद जब आदि गुरु शंकराचार्य बद्रीनाथ पहुँचे, तो उन्होंने पुजारियों से मूर्ति के बारे में पूछा। पुजारियों ने बताया कि मूर्ति को हमारे पूर्वजों ने उपद्रवियों से बचाने के लिए नदी में बहा दिया था और यह ज्ञात नहीं कि किस दिशा में बहाई गई।

 आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा मूर्ति की पुनः प्राप्ति

यह सुनते ही शंकराचार्य ध्यानस्थ हो गए और अचानक नारद कुंड की ओर चल पड़े।
भीषण जलधारा देखकर सभी पुजारी चिंतित हो गए, क्योंकि नारद कुंड में किसी का बच पाना लगभग असंभव माना जाता था।

लेकिन वे दिव्य पुरूष थे — कुछ ही देर बाद जब वे बाहर आए, उनके हाथों में बद्रीविशाल की वही दिव्य मूर्ति थी।
तब से आज तक उसी मूर्ति की पूजा बद्रीनाथ धाम में की जाती है।

 ये मूर्ति क्यों विशेष है?

यह केवल पत्थर की प्रतिमा नहीं, बल्कि भगवान विष्णु का साक्षात विग्रह मानी जाती है, जिसे शंकराचार्य ने पुनः स्थापित कर सनातन धर्म की महान धरोहर को जीवित रखा।

इस धाम की आध्यात्मिक ऊर्जा, ऐतिहासिकता और दिव्यता इसके विश्व-भर में आदर का कारण है।
जब भी कोई भक्त बद्रीनाथ के दर्शन करता है, तो इस मूर्ति को देखकर भगवान विष्णु की उपस्थिति का अनुभव अवश्य करता है।

भक्तों के लिए संदेश

जब भी आप बद्रीनाथ धाम जाएँ, तो भगवान बद्रीविशाल के चरणों में शीश झुकाकर आदि गुरु शंकराचार्य को अवश्य स्मरण करें।
उनकी ही कृपा से यह दिव्य मूर्ति आज भी भक्तों को दर्शन दे रही है और ईश्वर की अनंत करुणा का अनुभव कराती है।

बद्रीनाथ धाम – कपाट बंद होने का कारण, अखंड ज्योति का रहस्य और रावल परंपरा (संशोधित व् बेहतर रूप)

शास्त्रों के अनुसार बद्रीनाथ धाम वह पवित्र स्थान है जहाँ 6 महीने मानवों द्वारा और 6 महीने देवताओं द्वारा भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।
केदारनाथ की तरह ही बद्रीनाथ मंदिर के कपट (द्वार) हर साल विशेष विधि-विधान के साथ 6 महीने के लिए बंद कर दिए जाते हैं।

 कपाट कब बंद और कब खुलते हैं?

भैया दूज के दिन कपाट बंद होते हैं।

अक्षय तृतीया के दिन कपाट पुनः खोले जाते हैं।

विजयादशमी को कपाट बंद होने की आधिकारिक घोषणा होती है।

महाशिवरात्रि के दिन अगले वर्ष कपाट खुलने की तिथि तय होती है।

कपाट 6 महीने के लिए क्यों बंद होते हैं?

बद्रीनाथ धाम उत्तराखंड के चमोली जिले में समुद्र तल से बहुत अधिक ऊँचाई पर स्थित है।
अक्टूबर–नवंबर से अप्रैल–मई तक यहाँ अत्यधिक बर्फबारी होती है। पूरा क्षेत्र कई फीट मोटी बर्फ से ढका रहता है और लोगों का पहुँचना लगभग असंभव हो जाता है।

इसी कारण:

कड़ाके की ठंड

प्रतिकूल मौसम

सुरक्षा की सीमाएं
को देखते हुए हर वर्ष सर्दियों में कपाट बंद कर दिए जाते हैं ताकि मंदिर की पवित्रता बनी रहे।

कपाट बंद रहने पर पूजा कहाँ होती है?

जब बद्रीनाथ मंदिर के द्वार बंद होते हैं, तब भगवान बद्री विशाल की उत्सव मूर्ति को जोशीमठ स्थित नरसिंह मंदिर में स्थापित किया जाता है।
वहीं पूरे 6 महीने सभी पूजा-अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं।

कपाट खुलने पर दीप पहले से जलता हुआ कैसे मिलता है?

यह बद्रीनाथ धाम का सबसे चमत्कारिक और रहस्यमयी तथ्य है।

जब कपाट बंद किए जाते हैं, तब मुख्य पुजारी गर्भगृह में अखंड ज्योति प्रज्वलित कर जाते हैं।
6 महीनों तक:

मंदिर बर्फ में ढका रहता है

कोई मानव अंदर प्रवेश नहीं कर सकता

न तेल डाला जाता है न बाती बदली जाती है

फिर भी जब कपाट खुलते हैं, दीपक जलता हुआ पाया जाता है।

लोग इसे:

भगवान नारायण की कृपा,

देवताओं की उपस्थिति
या

दिव्य ऊर्जा का प्रमाण
मानते हैं।

यह दृश्य हर भक्त के लिए जीवनभर याद रहने वाला अनुभव होता है।

 बद्रीनाथ के रावल (मुख्य पुजारी) कैसे चुने जाते हैं?

बद्रीनाथ धाम की एक अनोखी परंपरा है:

➡ मुख्य पुजारी “रावल” केवल केरल के नंबूदरी ब्राह्मण ही बन सकते हैं।

यह परंपरा आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में स्थापित की थी।
उनका उद्देश्य था:

उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक एकता,

परंपराओं का आदान-प्रदान

और संपूर्ण भारत में सनातन धर्म को जोड़ना।

रावल बनने की प्रक्रिया

केवल वही नंबूदरी ब्राह्मण योग्य होते हैं जिनके पास वेद और शास्त्रों का गहरा ज्ञान हो।

पहले उन्हें नायब रावल बनाया जाता है ताकि वह सभी परंपराओं को सीख सकें।

बद्रीनाथ मंदिर समिति ही अंतिम चयन करती है।

यह परंपरा हजारों वर्षों से बिना किसी बदलाव के चली आ रही है, जो बद्रीनाथ धाम की महान धार्मिक महिमा को दर्शाती है।

हालांकि यह स्थान भगवान विष्णु का पवित्र धाम है, फिर भी यहाँ शंख नहीं बजाया जाता। इसके पीछे एक दिलचस्प पौराणिक कथा है। लेकिन इस कथा को जानने से पहले इसके अन्य रहस्यों को समझ लेते हैं।

 बद्रीनाथ मंदिर में मूर्ति से जुड़ा रहस्य

बद्रीनाथ धाम के रहस्य 2026

बद्रीनाथ मंदिर में भगवान विष्णु की जो दिव्य मूर्ति स्थापित है, उसकी पूजा प्राचीन काल से होती आ रही है। यह मूर्ति लगभग 1 मीटर लंबी है और शालिग्राम शिला से निर्मित है। मान्यता है कि इस प्रतिमा को आदि गुरु शंकराचार्य ने सातवीं शताब्दी के आसपास अलकनंदा नदी से निकालकर बद्रीनाथ में स्थापित किया था।

यह भी कहा जाता है कि यह मूर्ति स्वयं-प्रकट (स्वयंभू) विष्णु विग्रहों में से एक है। उस समय मंदिर की सुरक्षा के लिए सैनिक तैनात नहीं होते थे, इसलिए हूणों और बौद्ध उपद्रवियों के डर से पुजारियों ने इस प्रतिमा को सुरक्षित रखने के लिए अलकनंदा नदी में प्रवाहित कर दिया था।

सैकड़ों वर्षों बाद जब आदि शंकराचार्य बद्रीनाथ पहुंचे और उन्होंने मूर्ति के बारे में पूछा, तो पुजारियों ने बताया कि हमारे पूर्वजों ने उपद्रवियों के डर से इस प्रतिमा को नदी में बहा दिया था। हमें यह भी ज्ञात नहीं है कि उन्होंने किस दिशा में मूर्ति को प्रवाहित किया था।

यह सुनकर शंकराचार्य गहरे ध्यान में लीन हुए और फिर अलकनंदा की ओर चल पड़े। अचानक वे नारद कुंड में कूद गए। नारद कुंड का प्रवाह बेहद तीव्र था, उसमें किसी का बच पाना लगभग असंभव माना जाता था। लेकिन जब वे बाहर आए, तो उनके हाथों में भगवान बद्री विशाल की वही दिव्य मूर्ति थी।

तब से आज तक उसी प्रतिमा की पूजा की जाती है—जिसके दर्शन का सौभाग्य हमारी पीढ़ी को आदि गुरु शंकराचार्य की कृपा से प्राप्त हुआ है।

 ये मूर्ति सिर्फ पत्थर नहीं — भगवान विष्णु का साक्षात विग्रह है

यह सिर्फ एक शिला-मूर्ति नहीं, बल्कि भगवान विष्णु का जीवंत स्वरूप मानी जाती है। आदि शंकराचार्य द्वारा नारद कुंड से पुनः स्थापित की गई यह प्रतिमा सनातन धर्म की अनमोल धरोहर है। इस धाम में आध्यात्मिक ऊर्जा, चमत्कारिक दिव्यता और ऐतिहासिक महत्व—तीनों का अद्भुत संगम है।

जब भी कोई भक्त बद्रीनाथ के दर्शन के लिए आता है, तो इस दिव्य मूर्ति के दर्शन भर से एक अद्भुत शांति और भगवान विष्णु की उपस्थिति का अनुभव होता है।

आप जब भी बद्रीनाथ धाम आएँ, तो भगवान बद्री विशाल के चरणों में नमन करने के साथ-साथ आदि गुरु शंकराचार्य को भी प्रणाम अवश्य करें। क्योंकि उन्हीं के प्रयासों से यह दिव्य प्रतिमा आज भी भक्तों को दर्शन दे रही है और अपनी अनंत कृपा सभी पर बनाए रखती है।

बद्रीनाथ धाम की परम्पराएँ और रहस्य – सरल और सुंदर भाषा में

बद्रीनाथ धाम की परम्पराएँ और मान्यताएँ इसे एक अत्यंत रहस्यमय और अलौकिक स्थान बनाती हैं। यहाँ की आध्यात्मिक ऊर्जा हर भक्त को गहराई से प्रभावित करती है। इस पवित्र धाम से जुड़े कई नियम, रीति-रिवाज़ और अनूठी परम्पराएँ इसे अन्य मंदिरों से अलग पहचान देती हैं।

 1. बद्रीनाथ में मूर्ति को स्पर्श करने का नियम

बद्रीनाथ मंदिर में विराजमान भगवान विष्णु की दिव्य मूर्ति को कोई भी आम भक्त स्पर्श नहीं कर सकता।
केवल मुख्य पुजारी — रावल ही इस मूर्ति को स्पर्श और धारण कर सकते हैं।

यह नियम मंदिर की पवित्रता और आध्यात्मिक शुद्धता बनाए रखने के लिए सदियों से पूरी कठोरता के साथ पालन किया जाता है।

 

2. रावल को वर्ष में दो बार स्त्री-वेश क्यों धारण करना पड़ता है?

यह बद्रीनाथ धाम की सबसे रहस्यमय परम्पराओं में से एक है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार:

बद्रीनाथ धाम में भगवान विष्णु नर-नारायण स्वरूप में विराजमान हैं।

यहाँ माता लक्ष्मी की पूजा अनिवार्य मानी जाती है।

कपाट बंद होने के समय (विजयदशमी के आसपास) लक्ष्मी जी के विग्रह को गर्भगृह में प्रतिष्ठित किया जाता है।

कपाट पुनः खुलने के समय (अप्रैल में) विशेष अनुष्ठान सम्पन्न होता है।

इस अनुष्ठान के दौरान रावल को लक्ष्मी जी की सखी – पार्वती का स्वरूप धारण करना पड़ता है।

क्यों?

क्योंकि हिन्दू परम्परा के अनुसार पुरुष किसी परस्त्री को स्पर्श नहीं कर सकता। इसलिए इस पवित्र अनुष्ठान के समय रावल स्त्री-वेश धारण करते हैं ताकि माता लक्ष्मी को गर्भगृह में से लेकर बाहर लाने की परम्परा पूर्ण हो सके।

यह परम्परा बद्रीनाथ धाम की आध्यात्मिक ऊर्जा को और भी रहस्यमयी और पवित्र बना देती है।

3. ब्रह्मकपाल – पितरों के मोक्ष का पवित्र स्थल

बद्रीनाथ धाम में स्थित ब्रह्मकपाल एक अत्यंत पवित्र स्थान है, जहाँ पिंडदान करने का विशेष महत्व है।
मान्यता है कि यहाँ पंडवों ने भी अपने पितरों का पिंडदान किया था।

यहाँ पिंडदान करने से:

पितरों की आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है

उनके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं

आत्मा नर्क लोक से मुक्त हो जाती है

शिव और ब्रह्मकपाल का रहस्य

स्कन्द पुराण के अनुसार:

भगवान ब्रह्मा अपने ही सृष्टि-रूप पर मोहित हो गए थे, जिससे शिव जी ने उनके पाँचवें सिर का वध कर दिया।

यह कृत्य ब्रह्महत्या माना गया।

इस दोष से मुक्ति पाने के लिए शिवजी ने ब्रह्मकपाल स्थल पर कठोर तपस्या की।

यहीं उन्हें ब्रह्महत्यादोष से मुक्ति मिली।

यही कारण है कि ब्रह्मकपाल को पितरों के मोक्ष का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है।

 4. वसु धारा झरना — मोक्ष देने वाला रहस्यमयी जल

बद्रीनाथ धाम के रहस्य 2026

बद्रीनाथ धाम से लगभग 4 किमी दूर स्थित यह झरना लगभग 400 फीट की ऊँचाई से गिरता है।
यह सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता ही नहीं, बल्कि कई रहस्यों का केंद्र माना जाता है।

वसु धारा का चमत्कारी रहस्य

मान्यता है कि:

महाभारत युद्ध के बाद पांडव इसी मार्ग से स्वर्गारोहण के लिए गए थे।

सहदेव ने अपने प्राण इसी स्थान पर त्यागे थे।

सबसे अनोखी परम्परा:

वसु धारा का जल हर किसी पर नहीं गिरता।
कहा जाता है:

जिन लोगों के मन में पाप या नकारात्मक विचार होते हैं, उन पर झरने की बूंदें नहीं गिरतीं।

जबकि सात्विक, पवित्र और निष्कपट आत्माओं पर इसका जल स्वतः गिरता है।

इसलिए इसे केवल जलप्राप्ति नहीं, बल्कि मोक्ष की प्राप्ति का प्रतीक माना जाता है।

सूर्य की किरणों में झरने की जल-बूँदें चमकती हैं, जो एक दिव्य आभा उत्पन्न करती हैं। यह दृश्य अत्यंत मन मोह लेने वाला होता है।

बद्रीनाथ कैसे पहुँचें? आसान और फ्रेंडली यात्रा गाइड

बद्रीनाथ, हिन्दू धर्म के चारधामों में से एक प्रमुख और अत्यंत पवित्र धाम है। यदि आप बद्रीनाथ के दर्शन करना चाहते हैं, तो यात्रा की शुरुआत आमतौर पर हरिद्वार या ऋषिकेश से होती है।

1. हरिद्वार / ऋषिकेश कैसे पहुँचे?

भारत के किसी भी राज्य से आने के दो मुख्य साधन हैं:

(A) ट्रेन

सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन—

हरिद्वार जंक्शन

ऋषिकेश रेलवे स्टेशन

दोनों जगह से बद्रीनाथ की यात्रा शुरू होती है।

(B) हवाई जहाज़

बद्रीनाथ के लिए सबसे नजदीकी एयरपोर्ट है—

जॉलीग्रांट एयरपोर्ट, देहरादून

यहाँ उतरकर आप टैक्सी/बस से बद्रीनाथ की ओर बढ़ सकते हैं।

2. हरिद्वार / देहरादून से बद्रीनाथ कैसे जाएँ?

(A) बस – सबसे किफायती विकल्प

यहाँ से आपको सरकारी GMOU/UTC बसें और प्राइवेट पर्वत बसें आसानी से मिल जाएँगी।

हरिद्वार → बद्रीनाथ दूरी : 320 किमी

समय : 11–12 घंटे

किराया : ₹600 – ₹900 प्रति व्यक्ति

हरिद्वार से बद्रीनाथ की डायरेक्ट बस सुबह 4 बजे से 7 बजे तक मिल जाती है।

अगर डायरेक्ट बस ना मिले तो:

हरिद्वार → जोशीमठ बस पकड़ें

जोशीमठ → बद्रीनाथ (50 किमी)

जोशीमठ से shared jeep आसानी से मिल जाती है लगभग ₹100 प्रति व्यक्ति

 

(B) टैक्सी – परिवार के लिए बेस्ट

अगर आप फैमिली या ग्रुप में यात्रा कर रहे हैं तो प्राइवेट पर्वत टैक्सी सबसे आरामदायक विकल्प है।

देहरादून/हरिद्वार → बद्रीनाथ टैक्सी किराया: ₹8,000 – ₹10,000 (सीजन के अनुसार)

3. बद्रीनाथ में रुकने के विकल्प

बद्रीनाथ धाम चारधामों में सबसे बड़ा और विकसित धाम है, यहाँ रुकने के कई विकल्प मिलते हैं:

1. आश्रम

किराया: ₹200 से ₹500

साधारण, साफ-सुथरे कमरे

2. GMVN गेस्ट हाउस

सरकारी गेस्ट हाउस

डॉरमिट्री: ₹450 – ₹1000

रूम: ₹1200 – ₹1500

3. प्राइवेट होटल

रेंज: ₹500 से ₹2000

सीजन में रेट थोड़े बढ़ जाते हैं

 

4. बद्रीनाथ में खाने के विकल्प

यहाँ हर तरह का खाना मिलता है:

नॉर्थ इंडियन

साउथ इंडियन

थाली: ₹80 से ₹300

ढाबे, होटल और रेस्टोरेंट हर जगह उपलब्ध

 

5. बद्रीनाथ में घूमने की सबसे खास जगहें

1. बद्रीनाथ मंदिर दर्शन

भगवान विष्णु की तपस्थली — सबसे पहले यहीं दर्शन होते हैं।

2. तप्त कुंड

मंदिर के पास प्राकृतिक गर्म जल कुंड।
यहाँ स्नान को बेहद पवित्र माना जाता है।

3. माना गाँव (3 किमी)

भारत का पहला गाँव — बेहद खूबसूरत जगह।
यहाँ मिलेंगे—

गणेश गुफा

व्यास गुफा

सरस्वती नदी

भीम पुल

4. भीम पुल

पौराणिक कथाओं के अनुसार भीम ने विशाल शिला से यह पुल बनाया था।

5. वसुधारा झरना (5 किमी ट्रेक)

380 फीट ऊँचा झरना—
कहते हैं कि इसकी बूँदें केवल पुण्यात्माओं पर गिरती हैं।

डिस्क्लेमर:
इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न धार्मिक ग्रंथों, मान्यताओं, पौराणिक कथाओं, ज्योतिषीय सिद्धांतों, पंचांगों और उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है। इसकी सटीकता, पूर्णता या विश्वसनीयता की हम कोई गारंटी नहीं देते।
इसका उद्देश्य केवल सामान्य जानकारी प्रदान करना है। किसी भी प्रकार के उपयोग या निर्णय की पूरी जिम्मेदारी पाठक की स्वयं की होगी।

 

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