12 ज्योतिर्लिंग: उत्पत्ति, 5 महाउपाय और अनसुलझे रहस्य सम्पूर्ण कथा, महत्व, और दर्शन का अचूक फल

12 ज्योतिर्लिंग: उत्पत्ति, 5 महाउपाय और अनसुलझे रहस्य सम्पूर्ण कथा, महत्व, और दर्शन का अचूक फल

 

1. श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग — चंद्रदेव और भगवान शिव की कृपा कथा

12 ज्योतिर्लिंग

बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम और सर्वप्रसिद्ध है श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग। यह गुजरात राज्य के काठियावाड़ क्षेत्र में, समुद्र तट पर स्थित है। समुद्र की लहरों की ध्वनि के बीच स्थित यह मंदिर केवल एक पूजा स्थली नहीं, बल्कि आस्था, शक्ति और अद्भुत चमत्कारों का जीवंत प्रमाण माना जाता है।

पुराणों में इसे “प्रभास क्षेत्र” कहा गया है। यही वह पवित्र स्थल है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीला का समापन किया था।

पौराणिक कथा: चंद्रदेव का अभिशाप और शिव की कृपा

दक्ष प्रजापति की 27 कन्याएँ थीं, जिनका विवाह चंद्रदेव से हुआ। परंतु चंद्रदेव का स्नेह और प्रेम केवल एक पत्नी रोहिणी पर केंद्रित रहा। इससे बाकी 26 पत्नियाँ दुखी रहने लगीं और उन्होंने यह पीड़ा अपने पिता दक्ष प्रजापति को बताई।

दक्ष ने चंद्रदेव को समझाने का बहुत प्रयास किया, परंतु रोहिणी के प्रति उनके अधिक प्रेम में कोई बदलाव नहीं आया। अंत में क्रोधित होकर दक्ष ने चंद्रदेव को क्षय (मंद होने / लुप्त होने) का श्राप दे दिया।

श्राप मिलते ही चंद्रदेव का तेज नष्ट होने लगा। जगत में अंधकार बढ़ गया, शीतलता का अभाव होने लगा और संसार में हाहाकार मच गया। असहाय चंद्रदेव इंद्र व अन्य देवताओं के साथ पितामह ब्रह्मा के पास पहुँचे।

ब्रह्मा जी ने कहा

“हे चंद्र, तुम प्रभास क्षेत्र में जाकर मृत्युंजय भगवान शिव की आराधना करो। वही तुम्हें इस श्राप से मुक्ति दे सकते हैं।”

चंद्रदेव ने प्रभास क्षेत्र में जाकर कठोर तपस्या की। उन्होंने 10 करोड़ बार “ॐ त्र्यम्बकं यजामहे…” महामृत्युंजय मंत्र का जप किया। उनकी श्रद्धा से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और चंद्रदेव से कहा—

 “तुम्हारा श्राप हटेगा, पर दक्ष के वचन भी सार्थक रहेंगे। कृष्ण पक्ष में तुम घटोगे और शुक्ल पक्ष में बढ़ोगे।”

 

यही कारण है कि हर पूर्णिमा पर चंद्रमा पूर्ण नज़र आता है, और अमावस्या को वह लगभग लुप्त हो जाता है।

श्राप मुक्त होने पर चंद्रदेव ने विनती की—

 “हे महादेव, कृपा करके यहीं निवास करें। यह स्थान आपके दिव्य प्रकाश से जगमगाता रहे।”

भगवान शिव ने पार्वती माँ के साथ यहाँ ज्योतिर्लिंग रूप में निवास करना स्वीकार किया। तब से यह ज्योतिर्लिंग सोमनाथ कहलाया —

क्योंकि चंद्र (सोम) ने शिव को अपना नाथ स्वीकार किया था।

सोमनाथ की महिमा

यहाँ दर्शन मात्र से चंद्र दोष दूर होता है।

भक्तों के जीवन से कष्ट, दरिद्रता और मानसिक तनाव समाप्त होते हैं।

श्रीमद्भागवत, महाभारत और स्कंदपुराण में इसकी विस्तृत महिमा का वर्णन है।

कहते हैं—

“सोमनाथ के दर्शन से जन्मों के पाप मिट जाते हैं और भक्त शिवकृपा के अधिकारी बनते हैं।”

2. श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग — गणेश–कार्तिकेय कथा और कैलाश का दक्षिण रूप

12 ज्योतिर्लिंग

बारह ज्योतिर्लिंगों में दूसरा दिव्य ज्योतिर्लिंग है श्री मल्लिकार्जुन, जिसे “दक्षिण का कैलाश” भी कहा जाता है। यह आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के पवित्र तट पर स्थित श्रीशैल पर्वत पर अवस्थित है। महाभारत, शिवपुराण और पद्मपुराण जैसे ग्रंथों में इसकी महिमा का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है।

 

पौराणिक कथा: विवाह का विवाद और माता-पिता का प्रेम

 

एक बार भगवान शिव और माता पार्वती के दोनों पुत्र —

श्री गणेश और श्री कार्तिकेय, विवाह के विषय में आपस में विवाद करने लगे। दोनों चाहते थे कि पहले उनका विवाह हो।

विवाद बढ़ता देख भगवान शिव और माता पार्वती ने यह समाधान दिया—

“जो पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके लौट आएगा, उसी का विवाह पहले होगा।”

यह सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर सवार होकर तेज गति से पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल पड़े।

दूसरी ओर, गणेश जी की काया स्थूल थी और उनका वाहन छोटा सा मूषक (चूहा)। दौड़ में जीतना उनके लिए संभव नहीं था।

परंतु गणेश केवल शरीर से ही नहीं, बुद्धि से भी अद्वितीय थे।

उन्होंने माता-पिता को प्रणाम किया और कहा—

 “माता-पिता ही संपूर्ण सृष्टि हैं। उनकी परिक्रमा करना ही पृथ्वी की परिक्रमा करने के समान है।”

गणेश जी ने शिव–पार्वती की सात बार परिक्रमा की, और प्रतिस्पर्धा पूरी मानी गई।

उनकी बुद्धिमानी और भक्ति से प्रसन्न होकर माता-पिता ने गणेश का विवाह रिद्धि और सिद्धि से कर दिया। बाद में उन्हें शुभ और लाभ नाम के पुत्र उत्पन्न हुए।

कार्तिकेय का रोष और मल्लिकार्जुन रूप का उदय

जब कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटे और यह देखा कि गणेश का विवाह हो चुका है, वे क्रोधित होकर क्रोंच पर्वत चले गए।

माता पार्वती और भगवान शिव अपने पुत्र को मनाने के लिए वहाँ पहुँचे, परंतु कार्तिकेय अपनी भावनाओं से आहत होकर आगे बढ़ गए। जिस स्थान पर शिव–पार्वती ने अपने पुत्र की प्रतीक्षा की, वह स्थान आगे चलकर श्रीशैलम कहलाया।

अपने पुत्र के प्रेम में व्याकुल होकर भगवान शिव ने वहीं ज्योतिर्लिंग स्वरूप धारण किया।

इस लिंग को मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग कहा गया—

 ‘मल्लिका’ = माता पार्वती

‘अर्जुन’ = भगवान शिव

माता और पिता, दोनों की उपस्थिति वाला यह ज्योतिर्लिंग शिव–शक्ति के मिलन का प्रतीक है।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंगकी महिमा

यहाँ दर्शन करने से दुख, भय और बाधाएँ दूर होती हैं।

भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और विवाह या पारिवारिक समस्याओं से मुक्ति मिलती है।

कहा जाता है कि यह एकमात्र स्थान है जहाँ शिव और पार्वती सदैव विराजमान रहते हैं।

शास्त्रों में लिखा है—“मल्लिकार्जुन का दर्शन करने मात्र से मोक्ष का मार्ग खुल जाता है।”

 

3. श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग – उज्जैन (मध्यप्रदेश)

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बारह ज्योतिर्लिंगों में से तीसरा ज्योतिर्लिंग श्री महाकालेश्वर मध्यप्रदेश के उज्जैन नगर में शिप्रा नदी के तट पर स्थित है। उज्जैन को प्राचीन काल में उज्जैनी और अवंतिका पुरी के नाम से जाना जाता था और यह भारत की सप्त पवित्र पुरियों में से एक है।
महाभारत, शिव पुराण और स्कंद पुराण में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है।

कथा के अनुसार —
अवंतिका पुरी में एक तेजस्वी और तपस्वी ब्राह्मण रहता था। उसी समय दुषाण नाम का एक अत्याचारी दैत्य था, जिसे ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था और वह अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर लोगों को सताता था। एक दिन उसने उस ब्राह्मण की तपस्या भंग करने की कोशिश की। जब अत्याचार सीमा पार कर गया, तब प्राणियों की रक्षा के लिए भगवान शिव स्वयं वहाँ प्रकट हुए।

शिवजी ने मात्र एक उग्र हुंकार से उस दैत्य का अंत कर दिया। सभी ब्राह्मणों और भक्तों ने भगवान शिव से निवेदन किया कि वे सदैव यहीं निवास करें। भक्तों की प्रार्थना स्वीकार करते हुए भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में यहाँ विराजमान हो गए।

क्योंकि भगवान शिव ने स्वयं काल (समय और मृत्यु) को नियंत्रित किया, इसलिए उनका नाम पड़ा —
“महाकाल” — समय के भी स्वामी।

यहाँ दर्शन और अभिषेक करने से जीवन के सभी भय, संकट और काल बाधाएँ दूर हो जाती हैं।

4. श्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग – नर्मदा नदी (मध्यप्रदेश)

12 ज्योतिर्लिंग

श्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्यप्रदेश में नर्मदा नदी के तट पर स्थित है। यहाँ नर्मदा अपनी धारा दो हिस्सों में विभाजित होकर बहती है, जिससे बीच में एक द्वीप बनता है, जिसका आकार ॐ (ओम्) जैसा दिखाई देता है। इस द्वीप को मांधाता पर्वत या शिवपुरी कहा जाता है।

कथाओं के अनुसार —
महाराज मांधाता ने इसी पर्वत पर कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था, इसलिए पर्वत का नाम मांधाता पड़ा। शिव पुराण के अनुसार ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दो स्वरूप माने जाते हैं:

1. ओंकारेश्वर — द्वीप पर स्थित

2. ममलेश्वर (अमलेश्वर) — नर्मदा के दक्षिणी तट पर स्थित

दोनों मंदिर अलग-अलग होने पर भी इन्हें एक ही ज्योतिर्लिंग की शक्ति माना गया है।

पौराणिक कथा के अनुसार —
विंध्याचल पर्वत ने मिट्टी (पार्थिव लिंग) से शिवजी की छह महीने तक उपासना की। प्रसन्न होकर शिवजी उनके सामने प्रकट हुए और वरदान दिया। उसी समय उपस्थित ऋषियों की प्रार्थना पर शिवजी ने अपने लिंग के दो रूप प्रकट किए — ओंकारेश्वर और ममलेश्वर।

ओंकारेश्वर मंदिर की एक विशेषता यह है कि यहाँ प्रतिदिन गुप्त आरती होती है, जिसमें केवल पुजारी उपस्थित होते हैं।

शिव पुराण में ओंकारेश्वर की महिमा का विस्तार से वर्णन है। कहा जाता है कि यहाँ दर्शन करने और नर्मदा स्नान करने से जन्म–मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

5. श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग – हिमालय (उत्तराखंड)

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श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग पर्वतराज हिमालय की ऊँची पहाड़ियों पर स्थित है। यह मंदिर लगभग 12,000 फीट की ऊँचाई पर, मंदाकिनी नदी के किनारे स्थित है। यहाँ का प्राकृतिक वातावरण और भक्तिभाव स्वयं दिव्यता का अनुभव कराते हैं। केदारनाथ के पूर्व में अलकनंदा नदी के तट पर बद्रीनाथ धाम स्थित है। आगे चलकर अलकनंदा और मंदाकिनी रुद्रप्रयाग में मिलती हैं, और फिर देवप्रयाग में भागीरथी नदी से मिलकर गंगा बनाती हैं। इस प्रकार गंगा का जल, केदारनाथ और बद्रीनाथ के चरणों का पावन स्पर्श लिए होता है।

इतिहास के अनुसार, वर्तमान केदारनाथ मंदिर का निर्माण 8वीं शताब्दी में आदि गुरु शंकराचार्य ने किया। माना जाता है कि इससे पहले यहाँ पांडवों द्वारा निर्मित शिव मंदिर मौजूद था।

पौराणिक कथा – पंच केदार की उत्पत्ति

महाभारत युद्ध में अपने ही कुल का विनाश करने के बाद, पांडव बहुत दुखी थे और अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए भगवान शिव से क्षमा मांगने हिमालय पहुंचे। लेकिन भगवान शिव उनसे मिलना नहीं चाहते थे और नंदी (बैल) का रूप लेकर छिप गए।

भीम ने नंदी का पीछा किया और उसे पकड़ने की कोशिश की, लेकिन शिवजी धरती में समा गए। तब धरती के अलग-अलग स्थानों पर भगवान शिव के शरीर के अंग प्रकट हुए:

स्थान प्रकट हुआ अंग

केदारनाथ पीठ (कुबड़ का ऊपरी भाग)
टुंगनाथ भुजाएँ
मध्यमाहेश्वर नाभि और पेट
रुद्रनाथ चेहरा
कल्पेश्वर जटाएँ (बाल)

इन पाँच स्थानों को पंच केदार कहा जाता है। पांडवों ने यहाँ मंदिर बनाकर शिवजी की पूजा की और अपने कर्मों से मुक्ति प्राप्त की।

भगवान शिव ने केदार धाम में त्रिकोणाकार ज्योतिर्लिंग रूप में सदैव रहने का वचन दिया, इसलिए यह स्थान अत्यंत चमत्कारी और पूजनीय माना जाता है।

2013 की विनाशकारी बाढ़ और “भीम शिला”

2013 में भीषण बाढ़ और पहाड़ी टूटने से पूरा क्षेत्र नष्ट हो गया, लेकिन केदारनाथ मंदिर सुरक्षित रहा। एक विशाल चट्टान लुढ़ककर मंदिर के पीछे आकर रुक गई, जिसने जल धारा को दो भागों में विभाजित कर दिया और मंदिर की रक्षा की। इस चमत्कारिक पत्थर को आज भीम शिला कहा जाता है।

कहते हैं, यहाँ शिव का आशीर्वाद और भक्तों की अटूट आस्था हमेशा जागृत रहती है।

6. श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग – महाराष्ट्र

श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र में सह्याद्री पर्वत शृंखला की ऊँची पहाड़ियों पर स्थित है। यह स्थान पुणे से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर है। घने जंगलों और प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा यह ज्योतिर्लिंग भक्तों के लिए पवित्र और अद्भुत आध्यात्मिक स्थल है।

पौराणिक कथा – राक्षस भीम का अंत

प्राचीन काल में भीम नामक एक शक्तिशाली राक्षस रहता था। वह लंका के राजा रावण के भाई कुंभकर्ण का पुत्र था। जब भीम बड़ा हुआ, उसकी माता ने उसे बताया कि उसके पिता का वध श्री राम (भगवान विष्णु के अवतार) ने किया था। यह सुनकर भीम क्रोध से भर गया और श्री विष्णु का वध करने का निश्चय किया।

वर पाने के लिए उसने 1000 वर्षों तक कठोर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे अजेय होने का वरदान दिया। वर मिलते ही भीम ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग शुरू कर दिया। उसने देवताओं पर आक्रमण कर दिया, इंद्र सहित कई देवताओं को देवलोक से बाहर कर दिया और संपूर्ण लोकों पर अधिकार जमा लिया।

भीम ने कामरूप (असम) के शिवभक्त राजा सुदर्शन को भी कैद कर लिया। राजा बंदीगृह में रहकर प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की पूजा करते थे।

भगवान शिव का प्रकट होना

एक दिन भीम ने गुस्से में राजा द्वारा बनाए गए शिवलिंग पर तलवार से वार किया। तलवार स्पर्श करते ही शिवलिंग से स्वयं भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने केवल एक हुंकार से भीम का अंत कर दिया।

यह चमत्कार देखकर देवता, ऋषि और मुनि वहाँ पहुँचे और भगवान शिव से आग्रह किया कि वे इस स्थान पर सदैव निवास करें।

भगवान शिव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और ज्योतिर्लिंग के रूप में वहीं स्थापित हो गए।

तभी से इस ज्योतिर्लिंग को “भीमाशंकर” के नाम से जाना जाता है।

महिमा

कहते हैं कि—

यहाँ आने से मन की सभी सात्त्विक इच्छाएँ पूर्ण होती हैं।

शिवजी के दर्शन और जलाभिषेक का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता।

यह ज्योतिर्लिंग भक्तों के जीवन से नकारात्मक ऊर्जा और बाधाएँ दूर करता है।

शिवपुराण में भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है।

7. श्री विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग — काशी, उत्तर प्रदेश

12 ज्योतिर्लिंग

भगवान शिव का सातवाँ ज्योतिर्लिंग श्री विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग पवित्र नगरी काशी (वाराणसी) में स्थित है। काशी को ऐसा स्थान माना गया है जिसका प्रलयकाल में भी विनाश नहीं होता। कहा जाता है कि जब सृष्टि का अंत होता है, तब स्वयं भगवान शिव अपनी प्रिय नगरी को त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं और सृष्टि के पुनः आरंभ होने पर इसे वापस स्थापित कर देते हैं। इसी कारण काशी को सृष्टि की आद्य स्थली कहा गया है।

काशी की अनंत महिमा

काशी में मनुष्य केवल जीवन नहीं जीता—मोक्ष प्राप्त करता है।
इस पवित्र भूमि पर प्रभु शिव स्वयं मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

यहाँ मृत्यु होने पर प्राणी भवसागर से मुक्त हो जाता है।

अंतिम समय में भगवान शिव स्वयं उसके कान में “तारक मंत्र” का उपदेश देते हैं, जिससे जीव पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाता है।

मत्स्यपुराण में कहा गया है:

“जप, तप और ध्यान न करने वाला, दुःखों से पीड़ित व्यक्ति भी यदि काशी में मृत्यु को प्राप्त हो जाए, तो उसे मोक्ष प्राप्त होता है।”

काशी में पाँच प्रमुख तीर्थ माने गए हैं

दशाश्वमेध घाट, लोलार्क कुण्ड, बिंदुमाधव, केशव तथा मणिकर्णिका घाट।
इसी कारण इसे “अविमुक्त क्षेत्र” कहा गया है, अर्थात शिव द्वारा कभी न छोड़ा जाने वाला स्थान।

काशी के तीन पवित्र क्षेत्र

क्षेत्र महत्व

ओंकारखंड (उत्तर) पवित्र तीर्थों का क्षेत्र
केदारखंड (दक्षिण) सिद्ध साधकों की भूमि
विश्वेश्वरखंड (मध्य) यहाँ स्थित है श्री विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग

श्री विश्वनाथ मंदिर इसी विश्वेश्वरखंड में स्थित है।

पौराणिक कथा — शिव ने काशी को अपना निवास क्यों बनाया?

कथा के अनुसार, विवाह के बाद भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश पर्वत पर निवास करते थे। समय बीतने पर माता पार्वती ने शिव से कहा:

“सारी स्त्रियाँ विवाह के बाद पति के घर जाती हैं। मैं अभी भी अपने पिता के घर (कैलाश) रह रही हूँ। कृपया मुझे अपने गृह लेकर चलिए।”

भगवान शिव ने माता पार्वती का आग्रह स्वीकार किया और उन्हें अपनी प्रिय नगरी काशी लेकर आए। यहाँ आकर उन्होंने विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में स्वयं को स्थापित किया।

विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन का फल

इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन व पूजन से सभी पापों और बाधाओं का नाश होता है।

जो भक्त प्रतिदिन श्री विश्वनाथ के दर्शन करता है, उसके योग–क्षेम (जीवन की व्यवस्था और सुरक्षा) का भार स्वयं भगवान शिव उठा लेते हैं।

ऐसा भक्त शिव के परमधाम का अधिकारी बन जाता है।

“काशी विश्वनाथ ही वह ज्योतिर्लिंग हैं जहाँ शिव स्वयं कहते हैं —
‘तुम भक्त बने रहो, बाकी मैं सँभाल लूँगा।'”

श्री त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग — नासिक, महाराष्ट्र

श्री त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र राज्य में नासिक से लगभग 30 किलोमीटर पश्चिम, ब्रह्मगिरि पर्वत के पास स्थित है। इसे बारह ज्योतिर्लिंगों में अत्यंत पवित्र माना गया है। यहाँ से ही पवित्र नदी गोदावरी का उद्गम भी होता है।

शिवपुराण में वर्णित कथा के अनुसार—

महर्षि गौतम अपने आश्रम में पत्नी अहिल्या के साथ तपस्या और यज्ञ करते थे। उनके सदाचार और समृद्धि को देखकर अन्य ऋषियों की पत्नियाँ ईर्ष्या करने लगीं। उन्होंने अपने पतियों को भड़काया और सभी ब्राह्मणों ने मिलकर भगवान गणेश की आराधना की, ताकि गौतम ऋषि का आश्रम से हटना हो जाए।

गणेशजी उनकी जिद देखकर एक दुबली गाय का रूप धारण कर गौतम ऋषि के खेत में पहुँचे। गौतमजी फसल बचाने के लिए हाथ में तृण लेकर गाय को धीरे से हटाने लगे, लेकिन जैसे ही उनका स्पर्श हुआ, गाय वहीं गिरकर मृत हो गई। ब्राह्मणों ने गौतम ऋषि पर गोहत्या का आरोप लगाया और उन्हें आश्रम छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

दुखी होकर गौतमजी ने ब्राह्मणों से प्रायश्चित का उपाय पूछा। उन्होंने कहा—

“गंगाजी को यहाँ लाकर उनके जल से स्नान करो और एक करोड़ पार्थिव शिवलिंग बनाकर शिवजी का अभिषेक करो। तभी तुम्हारा पाप मिटेगा।”

गौतम ऋषि ने कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए और बोले—

“गौतम! तुम पर लगाया गया आरोप छल से था। तुम पूर्णतः निष्पाप हो।”

गौतम ने भगवान से केवल यही वर मांगा कि शिवजी वहीं निवास करें। देवताओं और ऋषियों ने भी निवेदन किया। तब भगवान शिव त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में वहीं स्थापित हो गए।

उसी तपस्या के प्रभाव से गंगा भी वहाँ प्रकट हुईं और गोदावरी नदी के रूप में प्रवाहित होने लगीं।

ऐसा माना जाता है कि यहाँ पूजन-दर्शन से समस्त पाप मिट जाते हैं और अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है।

श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग — देवघर (बिहार / झारखंड सीमा क्षेत्र)

श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग बिहार–झारखंड सीमा पर संथाल परगना क्षेत्र के देवघर में स्थित है। शास्त्रों और लोक-परंपरा, दोनों में इस ज्योतिर्लिंग की महिमा अत्यंत प्रसिद्ध है। इसे “कामना लिंग” भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ की गयी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।

स्थापना से जुड़ी कथा

एक बार राक्षसराज रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अत्यंत कठोर तपस्या की। उसने अपने एक-एक कर नौ सिर काटकर शिवलिंग पर अर्पित कर दिए। जब वह अपना दसवाँ सिर चढ़ाने लगा, तो भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होकर प्रकट हुए।

उन्होंने रावण का हाथ पकड़कर उसे सिर काटने से रोका, उसके सभी सिर पुनः जोड़ दिए, और वर माँगने को कहा। रावण ने वर में अनुरोध किया—

“हे भोलेनाथ! आप इस शिवलिंग के रूप में मेरी लंका में विराजमान हों।”

भगवान शिव ने वरदान दिया, पर एक शर्त रखी—

“मार्ग में यदि तुमने शिवलिंग को कहीं भूमि पर रखा,
तो वह वहीं स्थापित हो जाएगा और फिर उठ नहीं सकेगा।”

रावण शिवलिंग लेकर लंका की ओर चला। रास्ते में उसे लघुशंका के लिए रुकना पड़ा। उसने शिवलिंग एक अहीर (ग्वाले) को पकड़ाने का प्रयास किया। भार अधिक होने के कारण अहीर शिवलिंग को संभाल न सका और उसे ज़मीन पर रख दिया।

रावण लौटकर आया और बहुत प्रयास किया, पर शिवलिंग को उठा न सका। अंत में, उसने शिवलिंग पर अपने अंगूठे का निशान बनाकर शिवलिंग को वहीं छोड़ दिया।

ब्रह्मा, विष्णु और देवताओं ने आकर शिवलिंग की विधिवत प्रतिष्ठा की।
यही ज्योतिर्लिंग श्री वैद्यनाथ (बैद्यनाथ / बाबा बैद्यनाथ धाम) कहलाता है।

विशेषताएँ

शिवलिंग ऊँचाई में लगभग ग्यारह अंगुल है।

इसके शीर्ष पर अंगूठे के निशान जैसा गड्ढा है — यही रावण द्वारा बनाया गया निशान माना जाता है।

यहाँ विभिन्न तीर्थों से जल चढ़ाने की परंपरा है।

रोग और कष्टों से मुक्ति के लिए यह ज्योतिर्लिंग अत्यंत पूजनीय है।

पूजा का फल

पुराणों में बताया गया है—

> जो भक्त श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन-पूजन करता है, उसे पापों से मुक्ति मिलती है।
दैहिक (शरीर), दैविक (भाग्य) और भौतिक (जीवन की कठिनाइयों) कष्ट दूर हो जाते हैं।

भगवान शिव यहाँ वैद्य (चिकित्सक) के रूप में विराजते हैं और कल्याण एवं स्वास्थ्य प्रदान करते हैं।

श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग — द्वारका, गुजरात

श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग गुजरात के द्वारकापुरी से लगभग 17 मील (≈ 27 किलोमीटर) दूरी पर स्थित है। यह ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के प्रमुख और प्राचीन ज्योतिर्लिंगों में से एक है। शास्त्रों में कहा गया है—

जो व्यक्ति श्रद्धा से इसकी कथा सुनता या दर्शन करता है, वह पापों से मुक्त होकर सुख और मोक्ष प्राप्त करता है।

स्थापना से जुड़ी कथा

सुप्रिय नाम का एक धर्मात्मा और भगवान शिव का सच्चा भक्त था। वह मन, वचन और कर्म से शिव की भक्ति में तल्लीन रहता था। उसकी शिव आराधना और नित्य पूजा को देखकर दारुक नाम का राक्षस क्रोधित रहता था।

एक दिन, सुप्रिय नाव में यात्रा कर रहा था। अवसर पाकर दारुक ने नाव पर आक्रमण किया और सभी यात्रियों को बंदी बनाकर अपनी राजधानी ले गया। कैद में होने के बाद भी सुप्रिय ने अपने पूजा-नियम नहीं छोड़े और कारागार में भी भगवान शिव का ध्यान करता रहा।

दारुक को यह सहन नहीं हुआ और उसने सभी बंदियों को मारने का आदेश दे दिया। लेकिन सुप्रिय विचलित नहीं हुआ। वह एकाग्रता से शिव की प्रार्थना करता रहा—

“हे प्रभु! मुझे और इन निर्दोष बंदियों को मुक्ति दें।”

सुप्रिय की प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ज्योति के रूप में कारागार में प्रकट हुए। ऊँचे सिंहासन पर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान होकर उन्होंने सुप्रिय को पाशुपत अस्त्र प्रदान किया।

इस अस्त्र की शक्ति से दारुक और उसके अनुचरों का अंत हो गया। सुप्रिय भगवान शिव के धाम को प्राप्त हो गया।

भगवान शिव के आदेश पर यही ज्योतिर्लिंग नागेश्वर ज्योतिर्लिंग कहलाया।

विशेषताएँ

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग सर्पों के अधिपति (नाग) से संबंधित माना जाता है।

मान्यता है कि यहाँ दर्शन करने से विष, जादू–टोना और भय से मुक्ति मिलती है।

इस स्थान पर विशाल शिव प्रतिमा भी है, जो श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।

11. श्री रामेश्वर ज्योतिर्लिंग — रामेश्वरम (तमिलनाडु)

12 ज्योतिर्लिंग

श्री रामेश्वर ज्योतिर्लिंग भारत के दक्षिण छोर रामेश्वरम द्वीप पर स्थित है। इसका विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि इसकी स्थापना स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने की थी। स्कंदपुराण में इस ज्योतिर्लिंग की महिमा विस्तार से वर्णित है।

 स्थापना की कथा

जब भगवान श्रीराम लंका पर आक्रमण करने के लिए समुद्र तट पर पहुँचे, तो उन्होंने समुद्र से मार्ग देने की प्रार्थना की। उसी स्थान पर उन्होंने समुद्र की बालू से एक शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की पूजा की और विजय का आशीर्वाद माँगा।

मान्यता है कि जैसे ही श्रीराम जल पीने लगे, उन्हें आकाशवाणी सुनाई दी—

“हे राम! बिना पूजा किए जल ग्रहण कर रहे हो?”

इस पर श्रीराम ने तुरंत बालू से शिवलिंग बनाकर विधि-विधान से पूजन किया और रावण पर विजय का वर माँगा। भगवान शिव प्रसन्न हुए और श्रीराम को विजय का आशीर्वाद दिया।

इस पूजा के फलस्वरूप भगवान शिव ने वहाँ ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा निवास करने का वचन दिया। यही शिवलिंग “रामेश्वरम” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

 दूसरी कथा

रावण का वध करने के बाद जब श्रीराम वापस लौटे, तो गन्धमादन पर्वत पर रुके। वहाँ कई ऋषि और मुनिगण उनके दर्शन करने आए।

श्रीराम ने विनम्र होकर उनसे कहा:

“रावण ब्राह्मण कुल में जन्मा था, इसलिए उसके वध से मुझ पर ब्रह्महत्या का दोष लगा है। इससे मुक्ति का उपाय बताइए।”

ऋषियों और मुनियों ने एक स्वर में कहा कि यदि श्रीराम वहाँ शिवलिंग की स्थापना कर उसकी पूजा करें, तो वे इस दोष से मुक्त हो जाएँगे। भगवान श्रीराम ने मन्नत के अनुसार शिवलिंग स्थापित किया और तभी से यह स्थान रामेश्वर ज्योतिर्लिंग कहलाया।

भगवान श्रीराम ने ऋषियों की सलाह स्वीकार करते हुए हनुमानजी को कैलास पर्वत भेजा, ताकि वे स्वयं भगवान शिव द्वारा प्रतिष्ठित शिवलिंग लेकर आएँ। हनुमानजी तुरंत कैलास पहुँच गए, किंतु उस समय उन्हें वहां शिवजी के दर्शन नहीं मिले। वे वहीं तपस्या में लीन हो गए। तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी प्रकट हुए और हनुमानजी को शिवलिंग देकर रामेश्वर लौटने का वरदान दिया।

उधर रामेश्वर में शुभ मुहूर्त बीतने का भय था। इसलिए सीतामाता ने समुद्र की बालू से स्वयं शिवलिंग बनवाया और विधि-विधान से स्थापना कर दी। जब हनुमानजी शिवलिंग लेकर लौटे और यह दृश्य देखा, तो उन्हें बहुत दुःख हुआ। उन्होंने अपनी व्यथा श्रीराम को सुनाई।

भगवान श्रीराम ने कहा:

“हनुमान, यदि तुम चाहो तो इस लिंग को उखाड़कर अपने लाए हुए लिंग को स्थापित कर दो।”

हनुमानजी अत्यंत प्रसन्न होकर शिवलिंग को उखाड़ने लगे, किंतु वह अडिग रहा। उन्होंने पूरी शक्ति लगाई, यहाँ तक कि अपनी पूँछ में शिवलिंग लपेटकर उखाड़ने का प्रयास किया — परंतु शिवलिंग अपनी जगह से रत्तीभर भी नहीं हिला। उलटे हनुमानजी दूर जा गिरे और मूर्च्छित हो गए। उनके शरीर से रक्त बहने लगा। यह देखकर माता सीता दुख से रोने लगीं और उनके शरीर पर हाथ फेरने लगीं।

कुछ समय बाद हनुमानजी की चेतना लौट आई। जैसे ही उनकी आँखें खुलीं, उन्होंने अपने सामने भगवान श्रीराम के परम ब्रह्म स्वरूप का दर्शन किया। भगवान श्रीराम ने उन्हें महादेव की महिमा समझाई और कहा कि यह शिवलिंग स्वयं जगत के निर्माता द्वारा स्थापित है, इसलिए यह अचल रहेगा।

हनुमानजी द्वारा लाया गया शिवलिंग भी वहीं समीप में स्थापित कर दिया गया। इसलिए यहाँ दो शिवलिंग हैं —
एक रामलिंग, और दूसरा हनुमान लिंग।

 महत्व

रामेश्वरम् एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है जहाँ भगवान विष्णु (राम) और भगवान शिव की पूजा साथ-साथ होती है।

ऐसा कहा जाता है कि यहाँ पर स्नान और पूजा करने से सभी पाप नष्ट होते हैं।

यह स्थान मोक्षदायी और हिंदुओं के प्रमुख चार धामों में से एक है।

विशेषता

यह एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है, जिसकी स्थापना भगवान श्रीराम ने स्वयं की थी।

यहाँ के मंदिर में १२ पवित्र जल-कुंड (तीर्थ) हैं, जहाँ स्नान करना विशेष पुण्यदायक माना जाता है।

इस स्थान पर शिव और विष्णु दोनों की पूजा का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

12. श्री घुश्मेश्वर / घुसमेश्वर ज्योतिर्लिंग

12 ज्योतिर्लिंग

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में अंतिम ज्योतिर्लिंग श्री घुश्मेश्वर महादेव है। इसे घुश्मेश्वर, घुसृणेश्वर या घृष्णेश्वर भी कहा जाता है। यह महाराष्ट्र में दौलताबाद से लगभग 12 मील दूर वेरुळ (एलोरा) गाँव के पास स्थित है।

कथा (पुराणों के अनुसार)

दक्षिण भारत में देवगिरि पर्वत के पास सुधर्मा नाम का एक तेजस्वी व तपस्वी ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सुदेहा था। दोनों में बहुत प्रेम था और जीवन सुख से बीत रहा था, परंतु एक कमी थी— उनके कोई संतान नहीं थी।

ज्योतिषीय गणना से ज्ञात हुआ कि सुदेहा से संतानोत्पत्ति संभव नहीं है। संतान पाने की तीव्र इच्छा के कारण सुदेहा ने अपने पति से आग्रह किया कि वह उसकी छोटी बहन घुश्मा से विवाह कर लें।

सुधर्मा ने पहले इनकार किया, परंतु पत्नी के ज़ोर देने पर उन्होंने घुश्मा से विवाह कर लिया।

घुश्मा की भक्ति

घुश्मा अत्यंत सरल, विनम्र और सदाचारिणी स्त्री थी। वह भगवान शिव की अनन्य भक्त थी।
हर दिन वह —

एक सौ एक (101) पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूर्ण श्रद्धा से पूजा करती,
और पूजा के बाद उन सभी लिंगों को एक तालाब में प्रवाहित कर देती थी।

भगवान शिव उसकी भक्ति से प्रसन्न हुए और कुछ समय बाद घुश्मा को एक सुंदर बालक प्राप्त हुआ।

सुदेहा भी पहले इस सुख में सहभागी रहीं, पर धीरे-धीरे ईर्ष्या और असूया ने उनके मन को ग्रसित कर लिया। उन्हें लगने लगा कि उनके पास कुछ भी नहीं बचा— न पति का स्नेह, न घर पर अधिकार, और न ही संतान।

ईर्ष्या का परिणाम

एक रात सुदेहा ने घुश्मा के युवा पुत्र की हत्या कर दी और शव को उसी तालाब में फेंक दिया, जिसमें घुश्मा प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग विसर्जित करती थीं।

सुबह घर में हाहाकार मच गया।
सुधर्मा और पुत्रवधू रोते-रोते बेहाल हो गए, किंतु घुश्मा बिना विचलित हुए भगवान शिव की पूजा में बैठ गईं।

पूजा समाप्त करने के बाद वह शिवलिंगों को विसर्जित करने तालाब गईं। लौटते समय उन्होंने देखा कि उनका पुत्र तालाब से बाहर निकलकर उनकी ओर आ रहा है और चरणों में गिर गया।

शिव का प्रकट होना

उसी क्षण भगवान शिव साक्षात प्रकट हुए।
वे सुदेहा के पाप पर अत्यंत क्रोधित थे और त्रिशूल उठाकर उसे दंड देने ही वाले थे।

तब घुश्मा  से बोलीं—

“प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मेरी बहन को क्षमा कर दीजिए।
मुझे मेरा पुत्र आपकी कृपा से मिल गया है।
और एक निवेदन है — लोककल्याण के लिए यहीं सदा निवास कीजिए।”

भगवान शिव घुश्मा की करुणा, क्षमा और भक्ति से प्रसन्न हो गए।

उन्होंने सुदेहा को क्षमा किया और स्वयं ज्योतिर्लिंग के रूप में वहाँ प्रकट होकर निवास करने लगे।

तभी से यह ज्योतिर्लिंग कहलाया —

“श्री घुश्मेश्वर महादेव”
(घुश्मा की भक्ति से प्रकट हुआ शिवलिंग)

विशेषता

यह द्वादश (12वाँ) और अंतिम ज्योतिर्लिंग है।

यहाँ दर्शन करने से पाप नष्ट होते हैं और लोक-परलोक का कल्याण होता है।

घुश्मा की निष्ठा, क्षमा और भक्ति इस ज्योतिर्लिंग की सबसे बड़ी प्रेरणा है।

12 ज्योतिर्लिंग के रहस्य, महत्व और पूजा विधि

भारत के 12 ज्योतिर्लिंग — केवल मंदिर नहीं, बल्कि ऐसी दिव्य शक्तियाँ हैं जहाँ स्वयं भगवान शिव “ज्योति” (तेज) के रूप में विराजमान हैं।
हर ज्योतिर्लिंग की अपनी अनोखी कथा, रहस्य और विशेष ऊर्जा है।

 1. सोमनाथ ज्योतिलिंग — गुजरात

रहस्य / मान्यता:
ऐसा माना जाता है कि आज भी अमावस्या की रात चंद्रदेव यहाँ समुद्र में स्नान करने आते हैं और सौंदर्य एवं तेज प्राप्त करके पुनः आकाश में जाते हैं।

2. महाकालेश्वर ज्योतिलिंग — उज्जैन, मध्यप्रदेश

विशेष रहस्य: भस्म आरती
यहाँ प्रतिदिन सुबह 4 बजे भस्म आरती होती है।
पुराने समय में प्रयोग होने वाली भस्म श्मशान की अर्ध भस्म होती थी।
आज यह गाय के गोबर की पवित्र राख से होती है।

 3. मल्लिकार्जुन ज्योतिलिंग — आंध्र प्रदेश

यह मंदिर 18 शक्तिपीठों में से एक है।
इसलिए यह एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ शिव + शक्ति दोनों एक साथ विराजते हैं।

 4. ओंकारेश्वर ज्योतिलिंग — मध्य प्रदेश

रहस्य:
यह द्वीप ॐ (ओम) के आकार का है।
मान्यता है कि सतयुग में यह मणि का, त्रेतायुग में सोने का, द्वापर में तांबे का, और कलियुग में पथर का हो गया।

 5. केदारनाथ ज्योतिलिंग — उत्तराखंड

रहस्य:
2013 की भीषण आपदा में मंदिर परिसर नष्ट हुआ, लेकिन ज्योतिलिंग और मुख्य मंदिर अडिग रहे।
शिवभक्त इसे “चमत्कार” मानते हैं।

 6. भीमाशंकर ज्योतिलिंग — महाराष्ट्र

भीमाशंकर मंदिर घने जंगल में स्थित है और 1985 में इसे वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया।

 7. काशी विश्वनाथ ज्योतिलिंग — वाराणसी, उत्तरप्रदेश

वाराणसी — एकमात्र स्थान जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का दिव्य वास माना गया है।
यह शहर शिवजी की नगरी होने के कारण कभी नष्ट नहीं हो सकता।

 8. त्र्यंबकेश्वर ज्योतिलिंग — महाराष्ट्र

यह एकमात्र ज्योतिलिंग है जिसमें तीन मुख हैं —
ब्राह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक।

 9. वैद्यनाथ / बैद्यनाथ ज्योतिलिंग — झारखंड

रहस्य:
रावण ने यहाँ अपने 10 सिर शिव को अर्पित किए थे।
शिव ने स्वयं वैद्य (चिकित्सक) बनकर रावण को वापस जीवित किया,
इसलिए इसका नाम पड़ा — “वैद्यनाथ” (वैद्य रूपी शिव)

 10. नागेश्वर ज्योतिलिंग — द्वारका, गुजरात

यह ज्योतिलिंग सर्प-दोष और विष के भय को नष्ट करता है।
यहाँ की दिव्य आवृत्ति मन और शरीर से नकारात्मक ऊर्जा दूर करती है।

11. रामेश्वरम ज्योतिलिंग — तमिलनाडु

यह एकमात्र ज्योतिलिंग है जिसे भगवान राम ने स्थापित किया था।
दूसरा शिवलिंग स्वयं हनुमान जी काशी से लाए थे।

 12. घृष्णेश्वर / घुश्मेश्वर ज्योतिलिंग — महाराष्ट्र

यह एलोरा गुफाओं के पास स्थित है।
मंदिर में पुरुषों को नंगे बदन (ऊपर वस्त्र हटाकर) जाकर पूजा करनी पड़ती है।

 शिवलिंग पूजा विधि (Step–By–Step)

चरण कैसे करें

1. स्नान ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करें
2. स्थापना शिवलिंग को साफ वेदी / थाली में स्थापित करें
3. अभिषेक जल → दूध → पंचामृत → जल (इस क्रम में)
4. सामग्री अर्पण चंदन, अक्षत, बेलपत्र, धतूरा, फूल
5. मंत्र 108 बार ॐ नमः शिवाय
6. आरती दीपक और धूप से शिवजी की आरती
7. भोग फल / मिश्री / सूखे मेवे चढ़ाएं

भक्तों के सवाल (FAQ)

1. 12 ज्योतिर्लिंग की पूजा कैसे करें?

सोमवार / शिवरात्रि पर पूजा श्रेष्ठ

108 बार द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का पाठ करें

 

 2. स्त्रियाँ शिवलिंग की पूजा कैसे करें?

जल / दूध अर्पित करें

शिवलिंग को सीधे नहीं छूना हो, तो नंदी से प्रणाम कर सकते हैं

मासिक धर्म में पूजा न करें

 

 3. अगर 12 ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर लिए जाएँ तो क्या होता है?

“सभी पाप नष्ट होते हैं और शिवलोक प्राप्त होता है।” (शिवपुराण)

4. पूजा शुरू करने से पहले क्या बोलें?

आचमन मंत्र:
ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः

फिर संकल्प लें

 5. शिवलिंग पर सबसे पहले क्या चढ़ाना चाहिए?

सबसे पहले जल या गंगाजल
फिर — दूध → पंचामृत → बेलपत्र।

 6. कैसे पता चले शिव हमारे साथ हैं?

संकेत:

डमरू / त्रिशूल बार-बार दिखना

बिना वजह ॐ नमः शिवाय सुनना

सपनों में शिव का आना

 

 7. भोलेनाथ को तुरंत कैसे प्रसन्न करें?

“ॐ नमः शिवाय” का 108 बार जाप

घी + शक्कर का सरल प्रसाद चढ़ाएँ

निष्कर्ष

12 ज्योतिर्लिंगों का दर्शन
जीवन को शांति, समृद्धि और मुक्ति देता है।“शिव ही सत्य हैं, शिव ही तत्त्व हैं, शिव ही ब्रह्म हैं।”

डिस्क्लेमर:
इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न धार्मिक ग्रंथों, मान्यताओं, पौराणिक कथाओं, ज्योतिषीय सिद्धांतों, पंचांगों और उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है। इसकी सटीकता, पूर्णता या विश्वसनीयता की हम कोई गारंटी नहीं देते।
इसका उद्देश्य केवल सामान्य जानकारी प्रदान करना है। किसी भी प्रकार के उपयोग या निर्णय की पूरी जिम्मेदारी पाठक की स्वयं की होगी।

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