महाशिवरात्रि 2026: 10 अचूक उपाय! धन, विवाह और सुख प्राप्ति की व्रत कथा

महाशिवरात्रि की कथा ✨
प्राचीन समय में चित्रभानु नाम का एक शिकारी रहता था। वह जीव-जंतुओं का शिकार करके अपना जीवन-निर्वाह करता था। कुछ समय बाद वह एक साहूकार का ऋणी हो गया, परंतु वह समय पर अपना ऋण चुका नहीं सका। इससे क्रोधित होकर साहूकार ने उसे शिवमठ में बंद कर दिया। संयोगवश उस दिन महाशिवरात्रि थी।शिकारी मठ में बैठा ध्यानपूर्वक शिवजी से संबंधित धर्म-कथाएँ सुन रहा था। चतुर्दशी के दिन उसने शिवरात्रि की व्रत-कथा भी सुनी।
संध्या होने पर साहूकार ने उसे बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी ने अगले दिन सारा ऋण चुका देने का वचन दिया, जिसके बाद साहूकार ने उसे मुक्त कर दिया।
रोज की तरह वह जंगल में शिकार करने निकल पड़ा, परंतु दिनभर बंदीगृह में रहने के कारण वह भूख-प्यास से अत्यंत व्याकुल था। शिकारी की तलाश में वह बहुत दूर निकल गया। रात होने पर उसने सोचा कि अब रात जंगल में ही बितानी पड़ेगी। तालाब के पास स्थित एक बेल-पत्र के वृक्ष पर चढ़कर वह रात काटने लगा। उस बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित था, परंतु बेल पत्र से ढका होने के कारण शिकारी को इसका ज्ञान नहीं था।
बैठने के स्थान को व्यवस्थित करने हेतु उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोगवश शिवलिंग पर गिरती गईं। इस प्रकार अज्ञानता में ही उसका व्रत और बेल-पत्र अर्पण हो गया।
कुछ देर बाद एक गर्भवती हिरनी पानी पीने तालाब पर आई। शिकारी ने उसे देख धनुष पर बाण चढ़ाया, पर जैसे ही वह तानने लगा, हिरनी बोली

“मैं गर्भवती हूँ, शीघ्र ही बच्चे को जन्म दूँगी। अभी मेरी हत्या करना उचित नहीं। मैं बच्चे को जन्म देकर वापस तुम्हारे पास आ जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना।”
हिरनी की विनती सुनकर शिकारी का मन पिघल गया और उसने बाण ढीला कर दिया। उसी समय उसके हाथ से टूटे बेल-पत्र फिर शिवलिंग पर गिर पड़े। इस प्रकार, अनजाने में उसने प्रथम प्रहर की पूजा कर ली।
कुछ ही समय बाद दूसरी हिरनी वहाँ से गुज़री। शिकारी ने फिर धनुष उठाया, पर हिरनी बोली —
“मैं रजस्वला काल से निवृत्त हुई हूँ और अपने प्रिय की खोज में इधर-उधर भटक रही हूँ। अपने पति से मिलकर मैं अवश्य तुम्हारे पास लौट आऊँगी।”
शिकारी ने उसे भी जाने दिया। बाण तानने और ढील देने के दौरान फिर बेल-पत्र शिवलिंग पर गिरे और द्वितीय प्रहर की पूजा पूर्ण हो गई।
रात्रि के अंतिम पहर में तीसरी हिरनी अपने दो बच्चों के साथ वहाँ पहुँची। शिकारी ने तुरंत बाण चढ़ाया, पर हिरनी बोली
“मेरे छोटे-छोटे बच्चे मेरे साथ हैं। मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर लौट आऊँगी। अभी मुझे मत मारो।”
हिरनी के मातृत्व भाव ने शिकारी के हृदय को स्पर्श किया। उसने उसे भी जाने दिया। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह बेल-पत्र तोड़ता रहा और वे शिवलिंग पर अर्पित होते रहे। इस प्रकार तृतीय और चतुर्थ प्रहर की पूजा भी पूर्ण हो गई।
कुछ देर बाद एक बलवान हिरन वहाँ आया। शिकारी ने दृढ़ निश्चय किया कि अब वह इसे अवश्य मारेगा। तभी हिरन बोला
“यदि तुमने मेरी तीनों पत्नियों और उनके बच्चों को मार दिया है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो। पर यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है, तो मुझे भी जाने दो, ताकि मैं उनसे मिलकर तुम्हारे पास लौट सकूँ।”
शिकारी ने पूरी रात की घटनाएँ उसे बताईं। तब हिरन बोला
“जैसे तुमने उन पर विश्वास किया, वैसे ही मुझ पर भी करो। मैं शीघ्र ही लौटकर तुम्हारे सामने प्रस्तुत होऊँगा।”
शिकारी ने हिरन को भी जाने दिया। अब रात समाप्त हो चुकी थी। अनजाने में उपवास, रात्रि-जागरण और बेल-पत्र अर्पण से उसका महाशिवरात्रि व्रत पूर्ण हो चुका था। इस पूजा का प्रभाव तुरंत दिखा— शिकारी का हिंसक मन कोमल और शांत हो गया। उसमें दया और करुणा का उदय हुआ।

कुछ ही देर बाद हिरन अपने परिवार सहित उसके सामने आ गया, परंतु इतना निर्मल प्रेम देखकर शिकारी का हृदय पिघल गया। उसने उन्हें जीवनदान दे दिया।
अनजाने में की गई पूजा का फल इतना महान था कि मृत्यु के बाद जब यमदूत उसकी आत्मा लेने आए, तब शिवगणों ने उसे रोक दिया और शिवलोक ले गए। शिवकृपा से अगले जन्म में वह राजा चित्रभानु बना और अपने पूर्व जन्म की स्मृति होने के कारण उसने महाशिवरात्रि का व्रत पुनः किया।
कथा का संदेश
महादेव को दिखावे, आडंबर और भोग की नहीं,
सच्ची भावना, श्रद्धा और करुणा की आवश्यकता है।
भगवान शिव उस पूजा को स्वीकार करते हैं जिसमें हृदय की पवित्रता हो—
न कि वह जो केवल रीति-रिवाज़ों या प्रदर्शन के लिए की जाए।
सत्य यही है —“यदि मन शुद्ध हो तो हर रात्रि ’शिव-रात्रि’ है।
महाशिवरात्रि विशेष – शिव और शक्ति की दिव्य प्रेम कथा

शिव और शक्ति (पार्वती) का प्रेम संसार में अद्वितीय और अनुपम है। यह प्रेम अनेक तप, परीक्षाओं और युगों के इंतज़ार के बाद पूर्ण हुआ। इस मिलन में जहाँ पार्वती जी का कठोर तप शामिल है, वहीं शिव जी की सदियों लंबी प्रतीक्षा भी।
सृष्टि के स्वामी होते हुए भी शिव के पास न अपना महल था, न आभूषण, न सिंहासन—केवल कैलाश पर्वत उनका निवास था। उनकी वेशभूषा सरल—बाघम्बर, गले में सर्प, शरीर पर भस्म; परन्तु उनके हृदय में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समाया हुआ था।
इसके विपरीत, पार्वती हर जन्म में राजकुल में उत्पन्न हुईं—राजकुमारी थीं, वैभव और सुख से पूर्ण, परंतु उनके हृदय में केवल शिव थे। उन्होंने कभी किसी अन्य की इच्छा नहीं की। अनेक जन्मों तक तपस्या करने के बाद वे अंतिम 108वें जन्म में देवी पार्वती के रूप में जन्मीं।
उससे पहले उनका जन्म दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के रूप में हुआ था। उस जन्म में भी उनका हृदय शिव के प्रति समर्पित था। जब दक्ष ने अपनी पुत्री सती का विवाह विष्णु भगवान से करने की इच्छा प्रकट की, तब सती ने दृढ़ता से कहा—
“मेरा वास्तविक सुख केवल महादेव में है।”
सती ने प्रेम और भक्ति से शिव को अपने पति के रूप में पाया। लेकिन दक्ष को यह स्वीकार नहीं था। वे शिव को तुच्छ समझते थे और उनका अपमान करते थे। इसी अहंकार में उन्होंने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया जिसमें सभी देवताओं को आमंत्रित किया, किंतु शिव और सती को नहीं।
सती बिना आमंत्रण के यज्ञ में पहुँचीं और वहाँ शिव का अपमान सहन न कर सकीं। उन्होंने कहा—
“जिस सभा में मेरे आराध्य का अनादर हो, वहाँ मेरा होना व्यर्थ है।”
और अग्निकुंड में कूदकर प्राण त्याग दिए।
सती की मृत्यु से व्याकुल होकर शिव ने क्रोध में समस्त यज्ञ का विनाश कर दिया। वे सती के शरीर को कंधे पर रखकर समस्त ब्रह्माण्ड में विचरते रहे। तब विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंडित किया। जहाँ-जहाँ उनके अंग गिरे, वहाँ 51 शक्तिपीठ स्थापित हुए।
समय बीतता गया। शिव का विरह और साधना बढ़ती गई। वहीं सती ने अपने वचन को निभाते हुए हिमवान और मेना के यहाँ पुत्री रूप में पुनर्जन्म लिया — और उनका नाम पड़ा पार्वती।
नारद जी ने पार्वती को बताया कि शिव ही उनके पति होंगे, परंतु उन्हें कठोर तप करना होगा। तब पार्वती अपने हृदय की बात सखी को बताकर घने जंगल में कठोर तप करने चली गईं। उन्होंने जल तक छोड़ दिया—वर्षों नहीं, युगों तक तपस्या की।
शिव ने पहले सप्तऋषियों को, फिर स्वयं वटुक (बाल ब्राह्मण) रूप में जाकर पार्वती को समझाने का प्रयास किया, परंतु उनके अडिग संकल्प ने अंत में शिव को भी झुका दिया। उन्होंने पार्वती को पत्नी रूप में स्वीकार करने का वचन दिया।

यह वचन फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी, मतलब महाशिवरात्रि को पूर्ण हुआ।
और इस तरह शिव-शक्ति का महा-मिलन हुआ।
उनका प्रेम हमें क्या सिखाता है?
पार्वती जी ने राजमहल त्यागकर पर्वत की गुफाएँ चुनीं।
शिव जी ने संसार की अनदेखी करके पार्वती के प्रेम को स्वीकारा।
पार्वती ने शिव को पाने के लिए कठोर तप किया।
शिव ने सदियों तक प्रतीक्षा की।
जहाँ स्वार्थ समाप्त होता है, वहीं प्रेम आरंभ होता है।
आज के युग में जहाँ प्रेम का स्थान क्षणिक आकर्षण ने ले लिया है,
शिव-पार्वती का निष्काम और शाश्वत प्रेम हम सबके लिए प्रेरणा है।
यही कारण है कि आज भी महाशिवरात्रि को भक्त प्रेम, श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाते हैं—
उपवास, जागरण, पूजा और ध्यान के साथ—
और प्रार्थना करते हैं कि उनके जीवन में भी वैसा ही पवित्र प्रेम, विश्वास और एकता आए।
महाशिवरात्रि से जुड़े 20 महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके उत्तर
1. शिवरात्रि का दूसरा नाम क्या है?
कश्मीर के शैव मत में इस पर्व को हर-रात्रि, और स्थानीय बोलचाल में हेराथ या हेरथ कहा जाता है।
2. शिवरात्रि से कौन-सा भोग विशेष रूप से जुड़ा है?
ठंडाई — कहा जाता है कि यह भगवान शिव का प्रिय भोग है। इसमें भांग मिलाने से इसका महत्व और बढ़ जाता है।
3. महाशिवरात्रि का रहस्य क्या है?
महाशिवरात्रि वह रात्रि है, जब साधक अपने भीतर स्थित अनंत शून्यता — सृजन के मूल स्रोत — का अनुभव कर सकता है। शिव संहारक भी हैं और अत्यंत करुणामयी भी।
4. शिव के 11 नाम (एकादश रुद्र) कौन-कौन से हैं?
कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहिता, शास्त्र, अजपाद, अहिर्बुध्न्य, शंभू, चंड और भव।
5. एक वर्ष में कितनी बार शिवरात्रि आती है?
एक वर्ष में 12 मासिक शिवरात्रियाँ आती हैं।
इसके अतिरिक्त फाल्गुन मास में आने वाली एक विशेष शिवरात्रि महाशिवरात्रि कहलाती है।
6. शिवरात्रि के चार प्रकार कौन से हैं?
1. महाशिवरात्रि
2. नित्य शिवरात्रि
3. मासिक शिवरात्रि
4. सावन शिवरात्रि
7. भगवान शिव का मुख्य मंत्र / नारा क्या है?
ॐ नमः शिवाय
इसके अतिरिक्त महामृत्युंजय मंत्र शिवजी का अत्यंत पूजनीय वैदिक मंत्र है।
8. शिवजी का प्रिय भोग क्या है?
शिवजी को भांग, धतूरा, ठंडाई, खीर, मालपुआ, दूध, दही और बेर विशेष रूप से प्रिय हैं।
9. शिवरात्रि का मुख्य प्रसाद क्या है?
भांग, धतूरा और बेलपत्र शिवरात्रि के मुख्य प्रसाद माने जाते हैं।
10. महाशिवरात्रि किसका प्रतीक है?
यह वह रात्रि है जब भगवान शिव ने तांडव — सृजन, पालन और संहार के ब्रह्मांडीय नृत्य — को सम्पन्न किया।
इसे शिव-पार्वती विवाह की रात्रि के रूप में भी माना जाता है।
11. शिव का असली नाम क्या है?
भगवान शिव के अनेक नाम हैं — महादेव, शंकर, रुद्र, शंभू आदि।
वे निराकार और सर्वव्यापक हैं, अतः किसी एक नाम में सीमित नहीं हैं।
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12. महाशिवरात्रि के अन्य नाम क्या हैं?
महाशिवरात्रि, शिवरात्रि, और शिव की महान रात्रि।
13. महाशिवरात्रि की कथा क्या है?
चित्रभानु नामक एक भील शिकारी ने अनजाने में उपवास रखा और रातभर बेलपत्र शिवलिंग पर अर्पित किए।
पुण्य के फलस्वरूप उसे शिवलोक प्राप्त हुआ।
14. शिवरात्रि और महाशिवरात्रि में क्या अंतर है?
मासिक शिवरात्रि — हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी
महाशिवरात्रि — वर्ष में केवल एक बार, फाल्गुन महीने में
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15. शिवरात्रि का सार क्या है?
अंधकार और अज्ञान पर विजय।
यह शिवस्मरण, ध्यान, ईमानदारी, दान, क्षमा और आत्म-अनुशासन का संदेश देती है।
16. महिलाएँ शिवरात्रि का व्रत क्यों रखती हैं?
कुंवारी कन्याएँ उत्तम जीवनसाथी की कामना से,
और विवाहित महिलाएँ वैवाहिक सुख-समृद्धि हेतु।
17. शिवरात्रि में क्या खाया जा सकता है?
उपवास में प्रायः फलाहार लिया जाता है, जैसे —
साबूदाना खिचड़ी
कुट्टू की पूरी
फल / फ्रूट चाट
लस्सी
आलू के व्यंजन
18. इस वर्ष महाशिवरात्रि कब से प्रारंभ होगी?
(यह तिथि हर वर्ष बदलती है — उपयोगकर्ता वर्ष के अनुसार डाल सकते हैं।)
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19. महाशिवरात्रि का प्रमुख मंत्र क्या है?
ॐ ह्रीं ह्रौं नमः शिवाय
20. शिवरात्रि का व्रत क्यों रखा जाता है?
व्रत से शरीर में शुद्धि होती है, मन एकाग्र होता है और साधक अपने वास्तविक स्वरूप की ओर लौटता है।
महाशिवरात्रि के 10 अचूक उपाय — धन, सुख एवं समृद्धि प्राप्ति हेतु
महाशिवरात्रि वह पावन रात्रि है जब भगवान शिव अर्धरात्रि में ब्रह्मा जी के अंश से लिंग रूप में प्रकट हुए थे। अनेक स्थानों पर यह भी मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य विवाह का शुभ क्षण घटित हुआ। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से पूजा करने से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
1. पारद शिवलिंग की स्थापना
योग्य ब्राह्मण की सलाह लेकर पारद शिवलिंग की स्थापना करें एवं प्रतिदिन पूजा-अर्चना करें।
इससे धन वृद्धि और आय के नए स्रोत बनने लगते हैं।
2. गरीबों को भोजन कराएँ
महाशिवरात्रि के दिन जरूरतमंदों को भोजन कराएं।
इससे घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती और पितरों की आत्मा को शांति मिलती है।
3. काले तिल से शिवाभिषेक
जल में काले तिल मिलाकर शिवलिंग का अभिषेक करें और “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करें।
मन को शांति एवं तनाव से मुक्ति मिलती है।
4. आटे से 11 शिवलिंग बनाकर अभिषेक
आटे से 11 शिवलिंग बनाएं और 11 बार जलाभिषेक करें।
संतान प्राप्ति के योग बनते हैं।
5. महामृत्युंजय जप और 101 बार जलाभिषेक
शिवलिंग पर 101 बार जलाभिषेक करते हुए निम्न मंत्र का जप करें:
“ॐ त्र्यंबकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमिव बंधनान् मृत्युर्मुक्षीय मामृतात्।”
इससे रोग और कष्ट दूर होने लगते हैं।
6. 21 बेलपत्र अर्पित करें
21 बिल्वपत्रों पर चंदन से “ॐ नमः शिवाय” लिखकर शिवलिंग पर अर्पित करें।
इच्छाएँ पूर्ण होने का मार्ग प्रशस्त होता है।
7. नंदी (बैल) को हरा चारा खिलाएँ
मंदिर में नंदी को हरा चारा खिलाएं।
जीवन में सुख-समृद्धि आती है और रुकावटें समाप्त होती हैं।
8. तिल और जौ अर्पित करें
शिवजी को तिल और जौ अर्पित करें।
तिल पापों का नाश करते हैं,
जौ सुख और समृद्धि को बढ़ाते हैं।
9. विवाह में बाधा हो तो केसरयुक्त दूध का अभिषेक करें
विवाह में विलंब या बाधा हो तो केसर मिलाकर दूध शिवलिंग पर चढ़ाएं।
शीघ्र विवाह के योग बनते हैं।
10. मछलियों को आटे की गोलियाँ खिलाएं
नदी/तालाब में मछलियों को आटा खिलाते समय भगवान शिव का ध्यान करें।
धन प्राप्ति और आर्थिक उन्नति होती है।
महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं है — यह प्रेम, त्याग, साधना, संयम और जागरण की वह रात है, जब समस्त ब्रह्मांड की ऊर्जा शिव-तत्व में विलीन होती है।
इस पावन रात्रि का गहरा संदेश है कि —
अज्ञानता पर ज्ञान की विजय होती है, अहंकार का अंत होता है और सच्चा प्रेम समय, स्थिति और कठिनाइयों की सीमाओं से परे होता है।
महाशिवरात्रि वह रात है जब शिव और शक्ति — दो नहीं रहते, एक हो जाते हैं।
और यही मिलन जीवन का सत्य है —
ऊर्जा + चेतना = सृष्टि।
शिव-शक्ति की प्रेम कथा : केवल प्रेम नहीं, “धैर्य की साधना”
देवी पार्वती और भगवान शिव की कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम केवल आकर्षण नहीं होता, बल्कि एक तपस्या होता है।
देवी पार्वती ने शिव को पाने के लिए 108 जन्म लिए…
वह राजमहलों में जन्मीं, लेकिन प्रेम के लिए वनों में तप करने को तैयार हुईं।
शिव, जिन्हें संसार अघोरी, वैरागी, अनासक्त समझता था,
प्रेम के सामने पूर्ण समर्पित हो गए।
दोनों ने साबित किया कि —
जहाँ प्रेम में अहंकार हो, वहाँ मिलन संभव नहीं।
जहाँ प्रेम में समर्पण हो, वहाँ स्वयं शिव भी झुक जाते हैं।
क्यों महाशिवरात्रि “महामिलन की रात” है?
पुराण बताते हैं कि इस रात्रि में —
शिव का तांडव हुआ
ब्रह्मांडीय ऊर्जा का संचार हुआ
शिव का शक्ति से विवाह हुआ
और वही रात जीवन व सृष्टि की शुरुआत बनी
इसका अर्थ यही है कि हर अंत एक शुरुआत है।
अंधकार में ही प्रकाश जन्म लेता है।
इसलिए महाशिवरात्रि है —अंधेरे से उजाले की यात्रा।
व्रत का रहस्य : उपवास नहीं, उपासना
महाशिवरात्रि का व्रत शरीर को नहीं थकाता, बल्कि ऊर्जा से भर देता है।
व्रत का अर्थ है —
उप (निकट) + वास (रहना)
अर्थात ईश्वर के समीप रहना।
इस रात किया गया ध्यान, जप, साधना 100 गुना फल देती है।
क्योंकि यह रात ऊर्जा का चरम बिंदु होती है।
शिवलिंग : सृष्टि का मूल
शिवलिंग कोई साधारण पत्थर नहीं —
यह ऊर्जा का स्रोत है।
यह आकार —
ऊपर से गोल (अनंत आकाश का प्रतीक)
नीचे चौकोर (धरती का प्रतीक)
इसका भाव है —
ऊर्जा आकाश से उतरकर धरती को जीवन देती है।
बेलपत्र का रहस्य
जब शिकारी अनजाने में बेलपत्र शिवलिंग पर चढ़ा देता है,
भक्तिभाव के बिना भी —
उसकी मुक्ति हो जाती है।
इससे एक संदेश मिलता है —भगवान भाव से प्रसन्न होते हैं, वस्तु से नहीं।
शिव का संदेश : “मैं तुम्हारी पूजा के लिए नहीं, तुम्हारी मुक्ति के लिए हूँ।”
शिव भक्तों से कहते हैं —
“मुझे फूलों की नहीं, सच्चे हृदय की आवश्यकता है।”
शिव को शंख, सोना, रत्न, भोग नहीं चाहिए।
उन्हें चाहिए —
निर्मल मन
अहंकार रहित प्रेम
समर्पण
शिव कहते हैं —भाव में रहो, भोग में नहीं।
महाशिवरात्रि का वास्तविक फल
इस रात का सबसे बड़ा लाभ है आंतरिक परिवर्तन।
जब मन शांत होता है,
अहंकार खत्म होता है,
संकल्प जागता है —
तब चमत्कार होते हैं।
कुछ लोग धन की तलाश में पूजा करते हैं,
कुछ मनोकामनाओं के लिए।
लेकिन शिव कहते हैं —“मुझे कुछ मत माँगो, खुद को मेरे हवाले कर दो —
मैं तुम्हें वह दूँगा, जिसके बारे में तुमने सोचा भी नहीं।”
शिव-साधना = आकर्षण का सिद्धांत
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से —
जब हम शिव मंत्रों का जाप करते हैं,
हमारा मन उच्च ऊर्जा कंपन (high frequency vibration) उत्पन्न करता है।
इस vibration में तीन विशेषताएँ होती हैं:
1. सकारात्मक विचार आकर्षित होते हैं
2. धन और अवसर प्रवाहित होते हैं
3. चिंता और बेचैनी समाप्त होती है
इसीलिए महाशिवरात्रि को धन, सौभाग्य और सफलता का पर्व भी कहा गया है।
अंतिम संदेश : शिव में प्रेम है, और प्रेम में शिव
यह कहानी हमें सिखाती है —
प्रेम अधिकार नहीं, समर्पण है
प्रेम पाने के लिए पहले अपने भीतर शिव को जगाना होता है
जब प्रेम स्वार्थ रहित हो जाए,
तो स्वयं ब्रह्मांड उसे पूरा करने लगता है
पार्वती ने सिद्ध कर दिया कि
सच्चा प्रेम धैर्य माँगता है, भाग्य नहीं।
और शिव ने सिद्ध कर दिया कि जिसे पाने की साधना हो, वह नियति बन जाता है।
निष्कर्ष
महाशिवरात्रि वह रात है,
जो हमें सिखाती है —
अपने भीतर के अंधकार को मिटाओ,
शिव स्वयं उजाला बनकर उतरेंगे।
शिव तिथि नहीं हैं।
शिव एक अनुभव है।
शिव मंदिर नहीं हैं।
शिव वह शांति है, जो हृदय में उतर जाए।
शिव वही हैं —
जहाँ प्रेम है, जहाँ समर्पण है, जहाँ मौन है।
ॐ नमः शिवाय।
डिस्क्लेमर:
इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न धार्मिक ग्रंथों, मान्यताओं, पौराणिक कथाओं, ज्योतिषीय सिद्धांतों, पंचांगों और उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है। इसकी सटीकता, पूर्णता या विश्वसनीयता की हम कोई गारंटी नहीं देते।
इसका उद्देश्य केवल सामान्य जानकारी प्रदान करना है। किसी भी प्रकार के उपयोग या निर्णय की पूरी जिम्मेदारी पाठक की स्वयं की होगी।